उस शाम कड़ाके की सर्दी थी। आयशा नाम की वह नन्ही-सी बच्ची सड़क पर माचिस बेच रही थी। बेतरह कांपती उस बच्ची को शायद ठंड पहले से ही जकड़ चुकी थी। उसने कुछ नहीं खाया था। भूख के मारे उसका बुरा हाल था। इतनी सर्दी में तो उसे घर पर होना चाहिए था, लेकिन वह डरती थी कि अगर एक भी माचिस नहीं बिकी, तो उसका क्रूर पिता उसे बुरी तरह पीटेगा। जब ठंड और कमजोरी के कारण उसका चलना भी दूभर हो गया, तो वह एक कोने में जाकर बैठ गई।
सर्दी बढ़ती जा रही थी। बचने का कोई उपाय न देखकर उसने गरमाहट पाने की कोशिश में माचिस खोल कर एक तीली जलाई। आंखों के सामने रोशनी छा गई। उस प्रकाश-पुंज ने उसके सपने मानो साकार कर दिए हों। उसे क्रिसमस ट्री और अनेक उपहार दिखाई दिए। उसे अच्छा लगा। खुश होकर उसने सिर ऊपर उठाया, तो उसे आकाश में एक तारा टूटकर नीचे गिरता दिखा।
उसे याद आया कि उसकी दादी, जो अब इस दुनिया में नहीं थीं, कहती थीं कि जब कोई तारा टूटता है, तो उसका मतलब है कि कोई अच्छा इंसान मरा है और अब वह स्वर्ग जा रहा है। उसे अपनी दादी (लेखक ने इसे अच्छाई और स्नेह का प्रतीक कहा है) सामने दिखीं।
ये लो, उसकी तीली तो बुझ भी गई। और प्रकाश खत्म होते ही उसकी दादी भी अंधेरे में गुम हो गईं। वह फिर सर्दी से कांपने लगी। उसने तुरंत एक और तीली जलाई। उसे कुछ गर्माहट लगी और प्रकाश में दादी फिर से दिखने लगीं।
वह तीलियां जलाती रही, ताकि उसकी दादी कहीं दूर न हो जाए। जब उसकी अंतिम तीली बुझने लगी, तो दादी ने उसे गोद में उठा लिया और अपने साथ स्वर्ग ले गईं।