काशी के राजा ब्रह्मदत्त के राज्य में धर्मपाल नामक एक विद्वान रहते थे। उनमें नाम के अनुसार गुण भी थे। उनका एक ही पुत्र था अनंग। वह जब वयस्क हुआ, तो पिता ने उसे तक्षशिला के गुरुकुल में पढ़ने भेज दिया। वहां पांच सौ शिष्य थे। थोड़े ही दिन में अनंग सबसे आगे निकल गया। दुर्योग से एक दिन आचार्य का एक युवा पुत्र मर गया। सभी लोग रोने-धोने लगे। वे बात भी कर रहे थे, कैसा युवा लड़का था, बेचारा चल बसा।
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अनंग भी वहीं बैठा सब बातें सुन रहा था। उसके मुंह से निकल गया कि हम लोगों के यहां तो कोई युवा नहीं मरता। यह सुनकर सभी छात्र उसकी खिल्ली उड़ाने लगे। बात आचार्य तक पहुंची। उन्होंने बुलाकर सारी बात पूछी। अनंग ने कहा, गुरुदेव! धर्म का कुछ ऐसा प्रभाव है कि हमारे यहां सात पीढ़ियों तक कोई युवा नहीं मरा। यह सुनकर आचार्य को आश्चर्य हुआ। वास्तविकता जानने के लिए उन्होंने विद्यालय का दायित्व एक योग्य उपाध्याय को सौंपा और वह काशी की ओर रवाना हो गए।
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धर्मपाल ने उनका बड़ा स्वागत किया। कुशल-प्रश्न की बात आने पर आचार्य ने कहा, धर्मपाल! तुम्हारा पुत्र सहसा चल बसा। यह महान दुख की बात है। इस पर धर्मपाल जोरों से हंसा और बोला, महाराज! कोई दूसरा मरा होगा। हमारे यहां तो आज सात पीढ़ियों से कोई भी युवा नहीं मरा।
आचार्य ने अब अपना भेद खोला और युवावस्था में किसी के न मरने की वजह पूछी। धर्मपाल ने कहा, महाराज! हम धर्म का आचरण करते हैं, और पापकर्मों से दूर रहते हैं। हम सत्य बोलते हैं, और असत्य से दूर रहते हैं। हम सत्संग करते हैं, और दुर्जन से दूर रहते हैं। हम श्रमण, ब्राह्मण, प्रवासी, याचक, दरिद्र- सभी को अन्न-जल से संतुष्ट करते हैं। इसी कारण हमारे यहां छोटी उम्र में कभी कोई नहीं मरता।