राजा उदयन की पटरानी मागधी ने बुद्ध संघ के भिक्षुओं के लिए पांच सौ चादरें भिजवाईं। उन्हें ले जाने के लिए प्रधान भिक्षु आनंद जब राजमहल पहुंचे, तब राजा ने उनका समुचित सत्कार किया। राजा ने उन चादरों को वाहन पर लादकर उनके साथ भिजवाने की व्यवस्था भी कर दी।
आनंद राजभवन में हुए अभिवादन को स्वीकार कर जब चलने लगे, तब राजा ने यों ही विनोद में उनसे पूछा, भंते, इतनी चादरों का आप लोग क्या करेंगे? आनंद ने कहा, जिन भिक्षुओं के चीवर फट गए हैं, उनमें इनको वितरित करेंगे।
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प्रश्नोत्तर का सिलसिला आगे चल पड़ा। उदयन पूछते गए और आनंद उत्तर देते गए। उदयन ने पहले तो पूछा कि भिक्षु लोगों के फटे-पुराने चीवरों का क्या होगा? आनंद ने कहा, उनसे बिछौनों की चादर बनाएंगे। उदयन ने फिर पूछा, बिछौनों की जो फटी-पुरानी चादरें उतरेंगी, उनका क्या होगा?
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आनंद ने तुरंत कहा, उनमें-से छांटकर तकियों के गिलाफ बनाएंगे। राजा का सवाल था, फिर पुराने गिलाफों का क्या होगा? उन्हें जोड़ गांठकर गद्दी का भराव और झाड़न का प्रयोजन पूरा किया जायगा। फिर सवाल था, पुराने भराव और झाड़नों का क्या होगा? जवाब तैयार था-उन्हें गारे में कूटकर इमारतों पर किए जाने वाले पलस्तर में उपयोग कर लिया जाएगा।
इसके बाद उदयन ने कुछ नहीं पूछा। थोड़ी देर बाद उन्होंने फिर जिज्ञासा व्यक्त की, आप प्रकृति के दिए पदार्थों का अंत तक उपयोग करते हैं। आनंद ने कहा, भगवान ने बताया और सिखाया है राजन, कि जो वस्तुएं हम उपयोग में लाते हैं, उनका एक अंश भी व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए। राजा उदयन इससे बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने बुद्ध संघ की अर्थनीति को अपनी राज्य व्यवस्था में भी लागू किया।