किसी लक्ष्य की प्राप्ति में श्रद्धा का महत्वपूर्ण योगदान रहता है। यदि किसी कार्य को श्रद्धा, निष्ठा और विवेक से किया जाए, तो सफलता मिलने में कोई संदेह नहीं रहता। उपनिषदों में कहा गया है कि अंतरात्मा का ज्ञान सहज स्फुरित व प्रत्यक्ष होता है और ऐसी अंतरात्मा की क्रिया को ही श्रद्धा कहते हैं।
श्रद्धा अपने आप में सदा अविचल होती है। इसमें तर्क-वितर्क के लिए कोई स्थान नहीं होता। वेदों में कहा गया है कि विवेक व श्रद्धा के माध्यम से ही भगवान की प्राप्ति संभव है।
सिद्धांतों एवं नैतिक मूल्यों की रक्षा के लिए धर्म और कर्तव्य के प्रति श्रद्धा भावना के कारण ही हजारों लोग प्राणोत्सर्ग को तैयार हो जाते हैं। यदि राष्ट्र के प्रति श्रद्धा है, तो वह 'मातृभूमि' की तरह पूजनीय बन जाता है, और यदि श्रद्धा नहीं है, तो वह जमीन का टुकड़ा मात्र है।
श्री अरविंद आश्रम की श्रीमां कहती हैं, अंतरात्मा से उपजी श्रद्धा सच्ची होती है, पर यदि तुम्हारी बाह्य सत्ता में छल-कपट है और यदि तुम आध्यात्मिक जीवन के बदले वैयक्तिक सिद्धियों की प्राप्ति का प्रयत्न कर रहे हो, तो यह चीज तुम्हें पथभ्रष्ट कर सकती है।
जब श्रद्धा विवेकहीन होकर किसी के भी प्रति आकृष्ट होने लगती है, तब वह अंध श्रद्धा बनकर पतन का कारण बनती है। स्वयं सदाचार का जीवन जीने वाला और छल-प्रपंच से दूर रहने वाला ही श्रद्धा का वास्तविक लाभ उठाने का पात्र होता है।