संत भीखण के जीवन की एक घटना है। वह एक रात्रि प्रवचन दे रहे थे। आसोजी नाम का एक श्रावक सामने बैठा ऊंघ रहा था। भीखण ने उससे पूछा, आसोजी! नींद लेते हो? इस अचानक सवाल से आसोजी की तंद्रा टूटी और उन्होंने आंखें खोलकर कहा, नहीं महाराज! मैं नहीं सो रहा। मैं जगा हूं।
थोड़ी देर बाद नींद फिर वापस लौट आई। भीखणजी ने फिर पूछा, आसोजी, सोते हो? फिर वही उत्तर मिला, नहीं महाराज। नींद में डूबा आदमी सच कब बोलता है? और भला बोलना भी चाहे, तो बोल कैसे सकता है? नींद फिर से आ गई। नींद में जैसे हम मर ही जाते हैं। उस समय हमे कहां भान रहता है कि हम कुछ कर रहे हैं या नहीं। इसलिए नींद में व्यक्ति जो भी उत्तर देता है, उसकी कोई संगति नहीं होती।
हम समझते हैं कि उत्तर देने वाला गलत बोल रहा है। लेकिन नहीं, वह गलत नहीं बोल रहा है। वह जो कह रहा है, वह अपने हिसाब से सही कह रहा है। आगे जो कुछ हुआ, वह सोए व्यक्ति के सच को उजागर करता है। भीखण ने इस बार जो पूछा, वह अद्भुत था। उसमें बहुत गहरा अर्थ है। भीखण ने जोर से पूछा, आसोजी! जीते हो?
आसोजी तो सो रहे थे। निद्रा में सुनाई दिया होगा कि वही पुराना प्रश्न है। नींद में ‘जीते हो’, ‘सोते हो’ जैसा ही सुनाई दिया होगा! आसोजी ने आंखें मिचमिचाईं और बोले- नहीं महाराज! मैं तो जगा हूं।
भूल से ही सही, इस बार आसोजी के मुख से सच निकल आया। हमें नहीं भूलना चाहिए कि निद्रा में जो है, वह मृतक के ही तुल्य है। प्रमादपूर्ण जीवन और मृत्यु में अंतर ही क्या हो सकता है? जाग्रत ही जीवित है। जब तक हम विवेक और प्रज्ञा में जागते नहीं हैं, तब तक हम जीवित भी नहीं हैं।