सदियों पहले किसी मुल्क के लोग नीतिपूर्वक अपने काम किया करते थे। एक बार वहां के किसी व्यापारी ने कुछ अनैतिक काम कर दिया। दूसरों को जब पता चला, तो उन्होंने रिवाज के अनुसार उसे नगर से बाहर निकालने का निर्णय लिया।
उन दिनों दोषियों की सारी संपत्ति जब्त कर उन्हें पत्थर मारकर नगर से बाहर निकाला जाता था; हालांकि उन्हें मौत नहीं दी जाती थी। पत्थर फेंकनेवालों में एक कम उम्र का लड़का भी था। वह नगर के सबसे धनी व्यापारी का पुत्र था। उसने भी एक छोटा-सा पत्थर उठाया और पूरी ताकत से उस व्यक्ति की ओर फेंका।
पत्थर व्यापारी की आंख के नीचे लगा। वहां से खून की धार बहने लगी। घायल व्यापारी को बंधी हालत में छोड़कर लोग वहां से चले गए। पत्नी और बच्चों ने उसके बंधन खोले और उसे मुक्त कराया।
यह क्या मिला पत्थरों के बीच में
लहूलुहान व्यापारी की आंखों से आंसू बह रहे थे। अपमानित, लांछित, निर्धन और बेघर व्यापारी ने तय किया कि किसी अन्य नगर में जाकर बसना उचित होगा। इसके लिए वह तैयारी कर ही रहा था कि व्यापारी को एक चमक-सी दिखी।
धूल में कहीं कुछ झिलमिला रहा था। उसने उस पत्थर को उठाकर देखा, तो पाया कि वह बहुमूल्य रत्न है। व्यापारी ने पत्थर को संभाल कर रखा और समझदारी से उसका इस्तेमाल करने लगा।
इस तरह वह बन गया धनवान
दूसरे शहर में उसका कारोबार चल पड़ा। जल्दी ही उसकी माली हालत पहले जैसी हो गई। पुराने शहर के लोगों को पता चला, तो नगरसेठ उसे वापस लिवाने आया।
पर व्यापारी ने नया शहर नहीं छोड़ा। इस वाकये के बाद व्यापारी ने अपने बच्चों को नसीहत दी कि बुरी घटनाओं और अनुभवों में भी कहीं कुछ छिपा है, जिसे हम तभी देख पाते हैं, जब हमारे भीतर अंतर्दृष्टि जागृत होती है।