पुराणों के अनुसार, यह दिन भगवान गणेश को प्रसन्न करने का अत्यंत शुभ अवसर होता है। श्रीगणेश को विघ्नहर्ता, बुद्धि और सफलता के देवता माना गया है। इस दिन उपवास रखने और विधिवत पूजन करने से जीवन में आने वाले समस्त संकट दूर होते हैं और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। यह तिथि विद्यार्थियों, व्यापारियों, नौकरीपेशा लोगों और संतान सुख की इच्छा रखने वालों के लिए अत्यंत फलदायक मानी जाती है। विशेष रूप से यह दिन नवदंपतियों और नवकार्य आरंभ करने वालों के लिए अत्यंत शुभ है।
व्रत और पूजन का महत्व
धार्मिक मान्यता है कि इस दिन व्रत करने से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और भगवान गणेश अपने भक्तों पर विशेष कृपा बरसाते हैं। यह व्रत जीवन से मानसिक तनाव, कार्यों में विघ्न, पारिवारिक अशांति आदि को समाप्त कर सुखद जीवन की ओर अग्रसर करता है। श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत को करने से आत्मबल में वृद्धि होती है और कार्यों में सफलता मिलती है।
पूजा विधि
प्रातकाल स्नानकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजन स्थल को शुद्ध करके वहां पीला या लाल वस्त्र बिछाकर भगवान श्रीगणेश की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। उन्हें सिंदूर, अक्षत, दूर्वा, लाल फूल, पंचमेवा और मोदक अर्पित करें। इसके बाद “ॐ गं गणपतये नमः”मंत्र का जाप करें अथवा गणेश चालीसा, गणपति अथर्वशीर्ष या संकटनाशन स्तोत्र का पाठ करें। दिनभर व्रत रखते हुए फलाहार करें और संध्या को दोबारा पूजन करें। रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देकर पूजा संपन्न करें।
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चंद्र दर्शन का महत्व
आषाढ़ शुक्ल विनायक चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन शुभ माने जाते हैं। इस दिन रात्रि को चंद्रमा को अर्घ्य देने की विशेष परंपरा है। धार्मिक मान्यता है कि चंद्रमा को अर्घ्य देने से मन की शुद्धि होती है, शांति प्राप्त होती है और मानसिक विकार समाप्त होते हैं। चंद्रमा को शीतलता, मन और सौंदर्य का प्रतीक माना गया है। गणेश पूजन के साथ चंद्र पूजन करने से मानसिक संतुलन और पारिवारिक सामंजस्य बढ़ता है। कुछ क्षेत्रों में तो इस दिन विशेष चंद्र पूजन का विधान भी बताया गया है, जिससे मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण होती हैं।