हिन्दू पंचांग के अनुसार, चैत्र महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को महाशक्ति के मुख्य स्वरूप शीतला माता की पूजा होती है। शीतला अष्टमी दो दिन मनाई जाती है कहीं पर लोग सप्तमी के दिन तो कहीं अष्टमी के दिन मनाते है। इसे बूढ़ा बसोड़ा या लसौड़ा के नाम से भी जाना जाता है।
शीतला माता का स्वरूप
माता के नाम के अनुरूप शीतला मां का स्वरूप बहुत ही शीतल होता है। शीतला मां गधे की सवारी करती हैं। इनके हाथों में कलश, झाडू और सूप होता है। शीतला माता को रोगों को दूर करने की शक्ति होती है। माता के हाथ में झाडू होने का मतलब लोगों को सफाई के प्रति जागरुक करने से होता है। कलश में सभी 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास रहता है।कलश में सभी 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास रहता है। माता शीतला देवी की उपासना से सभी तरह पाप नष्ट हो जाते है।
बसोडा का महत्व
शीतला अष्टमी पर महिलाएं भोजन नहीं पकाती है बल्कि शीतला अष्टमी के एक दिन पहले भोजन पका लेती हैं। शीतला अष्टमी पर माता को प्रसाद चढ़ाया जाता है। बसोड़ा वाले दिन पर घर के सभी सदस्य साथ में मिलकर बासी भोजन करते हैं।
शीतला माता कई बीमारियों से बचाती हैं। ऐसी मान्यता है कि शीतला माता की पूजा करने से चेचक, खसरा, बड़ी माता, छोटी माता जैसी बीमारियां नहीं होती। ऐसी मान्यता है अगर किसी भी व्यक्ति को जब चेचक निकल आता है तो घर में साफ-सफाई का विशेष ध्यान दिया जाता है। नियम के अनुसार माता भगवती की पूजा होती है।