हर साल शाबान महीने की 15वीं तारीख को शब ए- बारात मनाया जाता है। ये शब्द दो शब्दों से मिलकर बना हुआ है। शब का मतलब होता है रात और बारात का मतलब होता है बरी करना । इस रात मुसलमान पूरी रात नमाज अदा करते हैं, कुरान पढ़ते हैं और अल्लाह से अपने पापों के लिए क्षमा मांगते हैं। इस दिन मुस्लिम समुदाय के लोग अपनो की सलामती के लिए दुआ भी मांगते हैं।
Shabe Barat Kab Hai: शब ए-बारात का त्योहार इस्लाम धर्म के सबसे महत्वपूर्ण त्योहार में से एक है। इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार हर साल शाबान महीने की 15वीं तारीख को शब ए- बारात मनाया जाता है। ये शब्द दो शब्दों से मिलकर बना हुआ है। शब का मतलब होता है रात और बारात का मतलब होता है बरी करना । इस रात मुसलमान पूरी रात नमाज अदा करते हैं, कुरान पढ़ते हैं और अल्लाह से अपने पापों के लिए क्षमा मांगते हैं। इस दिन मुस्लिम समुदाय के लोग अपनो की सलामती के लिए दुआ भी मांगते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस रात अगर सच्चे दिल से इबादत की जाए तो वो जरूर पूरी होती है। इस्लामी कैलेंडर के मुताबिक शब-ए-बारात हर साल शाबान के महीने में आती है। शाबान इस्लामी साल का आठवां महीना होता है। शाबान का महीना रजब के महीने के बाद आता है। इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक 12 फरवरी पीर यानी सोमवार के दिन शाबान का महीना शुरू होगा। शाबान के महीने की 15वीं तारीख को शब-ए-बारात मनाई जाती है। आइए जानते हैं कब है शब ए- बारात और क्या है इसका महत्व।
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कब है शब-ए-बारात 2024?
इस्लामी कैलेंडर के मुताबिक शब-ए-बारात शाबान महीने की 14 और 15वीं तारीख के बीच की रात को मनाई जाती है. इस साल शब-ए-बारात 25 फरवरी 2024 रविवार के दिन पड़ सकती है। हालांकि इसकी तारीख चांद के हिसाब से आगे-पीछे हो सकती है।
शब-ए-बारात की क्या है खासियत?
शब-ए-बारात की रात में आने वाले साल के तमाम कुदरती कामों का लेखा-जोखा करने की जिम्मेदारी अल्लाह फरिश्तों को देता है। कुछ लोगों का मानना है कि इस रात में खास इबादत की जाती है। इस रात में नफली इबादत की जा सकती है। नफली इबादत यानी नफील नमाज़ पढ़ना, कुरान की तिलावत करना,अल्लाह का जिक्र करना और दुआ करना।
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क्यों कहते हैं मगफिरत की रात
इस रात को बख्शीश की रात यानी मगफिरत की रात भी कहा जाता है। इस रात मुस्लिम लोग जागकर अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं। इस रात में की गई इबादत से गुनाहों से छुटकारा मिलता है। जरूरी नहीं कि इस रात की नमाज जमात के साथ ही पढ़ी जाए, इसे लोग अपने घरों में अलग-अलग पढ़ें तो ज्यादा बेहतर है। शब-ए-बारात पर लोग कब्रिस्तान जाते हैं और इंतकाल फरमा गए लोगों की कब्र पर उनकी मगफिरत के लिए दुआ मांगते हैं। इस्लाम धर्म में पांच ऐसी रातें बताई गई हैं जिन रात में मांगी गई दुआ जरूर कुबूल होती है। पहली जुमे की रात, दूसरी ईद-उल-फितर की रात, तीसरी ईद-उल-अजहा की रात, चौथी रजब की रात और पांचवीं निस्फ़ शाबान यानी शब-ए-बारात। इन रातों में दुआ मांगने से हर गुनाह माफ हो जाता है।