हिंदू धर्म में सावन के महीने को बहुत ही पवित्र और शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावन का महीना भगवान शिव को अत्यंत ही प्रिय होता है। ऐसा माना जाता है जो भी शिवभक्त सावन के महीने में हर दिन शिवजी की आराधना, पूजा-पाठ, मंत्रों का जाप और और जलाभिषेकर करता है उसकी सभी तरह की मनोकामनाएं जरूर पूरी होती हैं। इस साल सावन महीने की शुरुआत 11 जुलाई 2025, शुक्रवार के दिन से हो रही है। इस सावन में किसी भी तिथि का क्षय नहीं होगा जिससे पूरे 30 दिनों तक शिव आराधना करने का मौका शिव भक्तों को मिलेगा। सावन में शिवलिंग पर जल चढ़ाना, रुद्राभिषेक करना, महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना और सोमवार का व्रत रखना बहुत ही शुभ फलदायी होता है। आखिर शिवजी को सभी महीनों में सावन का ही महीना क्यों प्रिय होता है आइए जानते हैं।
भोलेनाथ को इसलिए प्रिय है सावन का महीना
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार माता सती अपने हर एक जन्म में पति के रूप में शिवजी को पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। माता सती अपने पिता राजा दक्ष के द्वारा करवाए गए यज्ञ में शिवजी के अपमान के कारण अग्नि कुंड में शरीर का त्याग कर दिया था। माता सीता का दूसरा जन्म हिमालय राज के घर में पार्वती के रूप में हुआ था। तब माता पार्वती ने अपने इस जन्म शिवजी को प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। माता की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी ने सावन के महीने में ही माता पार्वती संग विवाह किया था। इसलिए सावन का महीना भगवान शिव को बहुत ही प्रिय होता है।
सावन माह में रुद्र अवतार में होते हैं भगवान शंकर
सावन का महीना भगवान शिव को अत्याधिक प्रिय होने के पीछे एक अन्य मान्यता भी है, जिसके अनुसार सृष्टि का पालनहार भगवान जब चार माह की योग निद्रा में रहते हैं तो उस दौरान भगवान शिव सृष्टि का संचालन करते हैं लेकिन चतुर्दशी तिथि के दिन भगवान शिव भी विश्राम के लिए सो जाते हैं। भगवान इस दौरान अपने रुद्रावतार में होते हैं। धार्मकि मान्यातओं के अनुसार जब भगवान शिव रुद्रावतार में होते हैं तो जल्द प्रसन्न होते हैं। इस कारण से सावन के महीने में रुद्राभिषेक किया जाता है और पूजा का पूर्ण फल प्राप्त मिलता है।
सावन माह में अपने ससुराल आते हैं शिवजी
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावन के महीने में ही भगवान शिव अपने ससुराल पृथ्वीलोक में आते हैं जहां पर उनका जोरदार और भव्य स्वागत किया जाता है। सावन में भगवान शिव भक्तों को आशीर्वाद देते हैं।
समुद्र मंथन से जुड़ी कथा
एक अन्य मान्यता के अनुसार सावन के महीने में शिवजी ने समुद्र मंथन से निकला विष पीकर सृष्टि की रक्षा की थी। विष को शिवजी ने अपने कंठ में धारण कर लिया था जिसके कारण उन्हे नीलकंठ भी कहते हैं। गले में विष को धारण करने के कारण उनके शरीर का तापमान बहुत बढ़ने लगा था तब उनके शरीर के तापमान को कम करने के लिए उनके ऊपर लगातार शीतल जल डाल कर ताप को शांत किया था। इसी कारण से शिवजी को जल अतिप्रिय है। इसी कारण सावन महीने में शिव पूजा का महत्त्व और भी बढ़ जाता है।