गणेश चतुर्थी के दिन मनाया जाने वाला गणपति का महापर्व हजारों-हजार वर्षों से चला आ रहा है। गणपति भारत के सबसे लोकप्रिय देवता बन गए हैं। उन्हें परम विद्वान और बुद्धिशाली माना जाता है। जब आप किसी बच्चे की शिक्षा की शुरुआत करते हैं, तो आप गणपति की पूजा करते हैं। मान्यता है कि उन्हें भोजन अतिप्रिय है। आमतौर पर विद्वान लोग पतले-दुबले होते हैं, लेकिन ये अच्छे-खासे खाते-पीते विद्वान हैं।
शिव ने सुझाया गणपति का नाम
गणपति के बारे में कई कथाएं प्रचलित हैं। इनमें से एक कथा है, जिसमें वह कुबेर के यहां भोजन पर गए। कुबेर धन के स्वामी हैं। वे हर वक्त तमाम हीरे-जवाहरात से लदे रहते थे। कुबेर को अपनी धन दौलत का बड़ा घमंड था। उन्होंने अपने इष्टदेव शिव को पहनने के लिए आभूषण भेंट किए। शिव ने कहा, ‘मैं तो बस भस्म लगाता हूं। मुझे किसी आभूषण की जरूरत नहीं है। अगर तुम वास्तव में मेरे लिए कुछ करना चाहते हो, तो मेरे बेटे के लिए करो।’ शिव ने गणपति की ओर इशारा किया और कहा, ‘यह मेरा बेटा है। इसे भोजन पसंद है। इसे घर ले जाओ और भरपेट खाना खिलाओ, जिससे उसकी संतुष्टि हो जाए।’
फिर भी न भरा गणपति का पेट
गणपति महल के अंदर आए और आसन जमा लिया। उन्हें भोजन परोसा गया। गणपति ने भोजन करना शुरू कर दिया। खाना बार-बार बनाया जाता और गणपति उसे खत्म कर जाते। इस पर कुबेर ने कहा, ‘तुम छोटे बच्चे हो। उस हिसाब से तुमने बहुत ज्यादा खा लिया है।’ गणपति बोले, ‘मेरी चिंता मत कीजिए। मुझे अभी भी तेज भूख लगी है। आप खाना मंगवाइए।’ खाना खत्म हो चुका था इसलिए कुबेर ने अपने नौकरों को बाजार से और राशन खरीदने के लिए भेजा। धीरे धीरे कुबेर का पूरा खजाना खाली हो गया, सब कुछ बेचकर भोजन की व्यवस्था की गई, फिर भी गणपति का पेट न भरा।
कुबेर ने मांगी माफी
गणपति की थाली खाली थी, लेकिन अभी भी वह मिठाइयों का इंतजार कर रहे थे। उन्होंने कहा, ‘खीर कहां है, लड्डू कहां हैं?’ कुबेर बोले, ‘मुझसे गलती हो गई। मुझे अपनी संपत्ति का घमंड हो गया था। मैं यह जानता हूं कि मेरे पास जो भी है, वह सब शिव का ही दिया हुआ है, फिर भी एक मूर्ख की भांति मैं उन्हें वे तुच्छ आभूषण भेंट कर रहा था।’ कुबेर गणपति के पैरों में गिर गए और क्षमा याचना करने लगे। इसके बाद गणपति बिना मिठाई खाए ही वहां से चल दिए।
- एक योगी, दिव्यदर्शी, सद्गुरु, एक आधुनिक गुरु हैं। विश्व शांति और खुशहाली की दिशा में निरंतर काम कर रहे सद्गुरु के रूपांतरणकारी कार्यक्रमों से दुनिया के करोड़ों लोगों को एक नई दिशा मिली है। 2017 में भारत सरकार ने सद्गुरु को पद्मविभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया है।