देश भर में शारदीय नवरात्रि के समय रामलीला का मंचन किया जाता है। यानि आजकल देश के कोने कोने में रामलीला की धूम मची हुई है। शारदीय नवरात्रि के समय रामलीला मंचन की परंपरा सदियों से चली आ रही है।
विदेशों में भी होता है रामलीला मंचन
रामलीला अपने देश भारत में ही नहीं, बल्कि बाली, जावा, श्रीलंका जैसे देशों में प्राचीनकाल से ही किसी न किसी रूप में प्रचलित रही है
। रामलीला का मंचन नेपाल, थाईलैंड, लाओस, फिजी, दक्षिण अफ्रीका, कनाडा, सूरीनाम, मॉरीशस में भी होता है। थाईलैंड में रामायण को रामाकिआन कहते है। इन दिनों रामलीला का मंचन देखने तो सभी जाते है, पर बहुत कम लोगों को ही यह जानकारी होगी की क्यों इसका मंचन किया जाता हैं। आज हम इस लेख के माध्यम से जानेंगे की रामलीला मंचन का क्या इतिहास और क्यों इसका मंचन किया जाता है।
दशमी के दिन रावण-वध
नवरात्रि में दुर्गा मां के पूजन के साथ ही नौ दिन चलने वाली रामलीला के मंचन का शुभारंभ भी हो जाता है। रामलीला मंचन में मर्यादा पुरुषोत्तम राम के जीवन की प्रमुख घटनाओं को दर्शाया जाता है। दशमी के दिन रावण-वध का मंचन किया जाता है और रावण परिवार के पुतले जलाएं जाते हैं।
सदियों से चली आ रही रामलीला के मंचन की परंपरा
रामलीला मंचन लोक-नाटक का एक रूप है। इस परंपरा की शुरुआत उत्तर भारत से हुई। इसके साक्ष्य लगभग ग्यारहवीं शताब्दी में मिलते है। शुरुआती दौर में रामलीला मंचन महर्षि वाल्मीकि के महाकाव्य रामायण की पौराणिक कथा पर आधारित था, लेकिन अब इसकी पटकथा गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित महाकाव्य ‘रामचरितमानस’ पर आधारित है। कथाओं के अनुसार 16वीं सदी में तुलसीदास के शिष्यों नें रामलीला का मंचन करना प्रारंभ किया था। कहा जाता है कि उस समय जब गोस्वामी तुलसीदास जी नें रामचरितमानस पूरी करी थी तब काशी के नरेश नें रामनगर में रामलीला मंचन कराने का संकल्प लिया था। तभी से देशभर में रामलीला का मंचन प्रारंभ हुआ।