पितृपक्ष 2020: पितृपक्ष के दौरान पितृलोक से पितरदेव धरती अपने प्रियजनों के पास किसी न किसी रूप में आते हैं।
Pitru Paksha 2020 Date: इस बार 2 सितंबर से पितृ पक्ष आरंभ हो रहे हैं जो सर्वपितृ अमावस्या के दिन यानी 17 सितंबर को समाप्त हो जाएगा। हिंदू धर्म में अपने पूर्वजों और पितरों की आत्मा की तृप्ति के लिए 15 या 16 दिनों का श्राद्ध पक्ष होता है। इसमें हर रोज पितरों का तर्पण किया जाता है। प्रत्येक वर्ष भाद्रपद माह के शुक्लपक्ष की पूर्णिमा से सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या तक पितृपक्ष का समय होता है। इन 16 दिनों को पितृपक्ष, श्राद्धपक्ष या महालय कहा जाता है। इस बार पितृपक्ष की समाप्ति के बाद शारदीय नवरात्रि आरंभ नहीं हो सकेगा। आमतौर पर जब भी पितृपक्ष का आखिरी दिन होता है तो फिर उसके अगले दिन प्रतिपदा पर शारदीय नवरात्रि शुरू हो जाते हैं। लेकिन इस बार अधिकमास के कारण नवरात्रि पितृपक्ष की समाप्ति के एक महीने बाद आरंभ होगा। इस तरह का संयोग 19 साल पहले 2001 में बना था जब पितृपक्ष के समाप्ति के एक महीने बाद नवरात्रि शुरू हुआ।
पितृपक्ष का महत्व
पितृपक्ष अपने पूर्वजों को याद और उनके प्रति श्रद्धा भाव दिखाने का समय होता है। पितृपक्ष के दौरान पितृलोक से पितरदेव धरती अपने प्रियजनों के पास किसी न किसी रूप में आते हैं। ऐसे में जो लोग इस धरती पर जीवित है वे अपने पूर्वजों को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पितृपक्ष में उनका तर्पण करते हैं। तर्पण से मतलब होता है उन्हें जलदान, भोजनदान कर उनका श्राद्ध करने से होता है। मान्यता है कि पितृपक्ष में पितरदेव धरती पर पशु पक्षी और ब्राह्राणों के रूप में अपने प्रियजनों से मिलने आते हैं। ऐसे में पितरों की आत्मा की तृप्ति के लिए पवित्र नदियों में तर्पण, पिंडदान और ब्राह्राणों को भोजन करवाया जाता है। पितृपक्ष में तर्पण करने से पितृदोष और तमाम तरह के कष्ट दूर होते हैं।
17 सितंबर को सर्वपितृ अमावस्या
अश्विन माह की सर्वपितृ अमावस्या पितृपक्ष का आखिरी दिन होता है। सर्व पितृ अमावस्या पर श्राद्ध का विशेष महत्व होता है। इस तिथि पर उन पितरों का तर्पण किया जाता है जिनकी मृत्यु की तिथि किसी कारण से परिजनों का याद नहीं होती है। इसके अलावा पितृपक्ष में अलग-अलग तिथियों पर श्राद्ध किया जाता है।
श्राद्ध पूर्णिमा 1 और 2 सितंबर को
हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद माह के शुक्लपक्ष की पूर्णिमा से सर्वपितृ अमावस्या तक पितृपक्ष रहता है। इसमें पितरगण धरती पर अपने-अपने प्रियजनों से मिलने के लिए धरती पर आते हैं। इस बार पितृपक्ष में भाद्रपद की पूर्णिमा मंगलवार की सुबह साढ़े 9 बजे के बाद शुरू होगी जो अगले दिन यानी 2 सितंबर की सुबह करीब 11 बजे तक रहेगी। जिस कारण से पूर्णिमा का श्राद्ध 1 और 2 सितंबर को भी है।
कब से शुरू होगा अधिकमास
जैसे ही 17 सितंबर को सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध पक्ष समाप्त होगा उसके अगले दिन से अधिकमास आरंभ हो जाएगा। अधिकमास 16 अक्टूबर तक चलेगा फिर 17 अक्टूबर से शारदीय नवरात्रि आरंभ हो जाएगा।
क्या होता है अधिकमास
जिस चंद्रमास में सूर्य संक्रांति नहीं पड़ती उसे ही अधिकमास या मलमास कहा गया है। जिस चन्द्रमास में दो संक्रांति पड़ती हो वह क्षयमास कहलाता है। सामन्यतः यह अवसर 28 से 36 माह के मध्य एक बार आता है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार सूर्य के सभी बारह राशियों के भ्रमण में जितना समय लगता है उसे सौरवर्ष कहा गया है जिसकी अवधि 365 दिन 6 घंटे और 11 सेकेण्ड की होती है। इन्ही बारह राशियों का भ्रमण चंद्रमा प्रत्येक माह करते हैं जिसे चन्द्र मास कहा गया है। एक वर्ष में हर राशि का भ्रमण चंद्रमा 12 बार करते हैं जिसे चंद्र वर्ष कहा जाता है। चंद्रमा का यह वर्ष 354 दिन और लगभग 09 घंटे का होता है। परिणामस्वरुप सूर्य और चन्द्र के भ्रमण काल में एक वर्ष में 10 दिन से भी अधिक का समय लगता है। इस तरह सूर्य और चन्द्र के वर्ष का समीकरण ठीक करने के लिए अधिक मास का जन्म हुआ। लगभग तीन वर्ष में ये बचे हुए दिन 31 दिन से भी अधिक होकर अधिमास, मलमास या पुरुषोत्तम मास के रूप में जाने जाते हैं।