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परिवर्तिनी एकादशी कल, वामन रूप में होगी भगवान विष्णु की पूजा, जानें इस व्रत का विशेष महत्व

Mon, 21 Sep 2026 06:32 PM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

Parivartini Ekadashi 2026: मान्यता है कि करवट बदलते समय भगवान विष्णु प्रसन्न मुद्रा में रहते हैं और इस अवधि में भक्तिभाव तथा विनयपूर्वक उनसे की गई प्रार्थना विशेष फलदायी होती है।
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परिवर्तिनी एकादशी 2026 - फोटो : AI
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विस्तार
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भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी, पद्मा एकादशी या जलझूलनी एकादशी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं और भाद्रपद शुक्ल एकादशी के दिन अपनी शेषशैया पर करवट बदलते हैं। इसी कारण इस तिथि को परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है।
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पद्म पुराण में इस एकादशी की महिमा का विशेष उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि करवट बदलते समय भगवान विष्णु प्रसन्न मुद्रा में रहते हैं और इस अवधि में भक्तिभाव तथा विनयपूर्वक उनसे की गई प्रार्थना विशेष फलदायी होती है। इसलिए भगवान विष्णु की आराधना, व्रत और भक्ति के लिए यह तिथि अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।

परिवर्तिनी एकादशी 2026 तिथि और शुभ मुहूर्त
पंचांग के मुताबिक, भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 21 सितंबर 2026 की रात 8:00 बजे से शुरू 22 सितंबर 2026 की रात 9:43 बजे खत्म होगी। सूर्योदय के हिसाब से उदया तिथि मिलने के कारण, परिवर्तिनी एकादशी का मुख्य व्रत मंगलवार, 22 सितंबर 2026 को ही रखा जाएगा।
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वामन अवतार की पूजा से मिलता है सुख-सौभाग्य का आशीर्वाद
परिवर्तिनी एकादशी पर भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन वामन भगवान की आराधना करने से व्यक्ति के सुख, सौभाग्य और समृद्धि में वृद्धि होती है। धर्मग्रंथों में इस व्रत को पापों का नाश करने वाला और पुण्य प्रदान करने वाला बताया गया है। मान्यता है कि परिवर्तिनी एकादशी का व्रत करने से वाजपेय यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है। वहीं, जो भक्त भगवान विष्णु के वामन स्वरूप की श्रद्धापूर्वक पूजा करता है, उसे तीनों लोकों और त्रिदेवों की पूजा के समान फल प्राप्त होने की मान्यता है।

क्यों कहलाती है जलझूलनी एकादशी? मंदिरों में निकलती है भव्य शोभायात्रा
परिवर्तिनी एकादशी को जलझूलनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। एक धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी दिन माता यशोदा जलाशय पर जाकर श्रीकृष्ण के वस्त्र धोती थीं। इसी परंपरा से इस एकादशी का संबंध जल से जोड़ा जाता है। इस अवसर पर देश के कई मंदिरों में विशेष धार्मिक आयोजन किए जाते हैं। भगवान विष्णु की प्रतिमा या शालिग्राम को पालकी में विराजमान कर पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद ढोल-नगाड़ों के साथ शोभायात्रा निकाली जाती है। भगवान के दर्शन और इस धार्मिक उत्सव में शामिल होने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु उमड़ते हैं।
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