सनातन धर्म में प्रत्येक महीने की कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को व्रत, स्नान, दान आदि के लिये बहुत शुभ फलदायी माना गया है। एकादशी व्रत को करने से जगत के पालनहार भगवान विष्णु की असीम कृपा मिलती है। देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु चार माह के लिये योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसलिये इन चार महीनों को चतुर्मास कहा जाता है एवं धार्मिक कार्यों, ध्यान, भक्ति आदि के लिये यह समय श्रेष्ठ माना जाता है। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी पद्मा एकादशी, परिवर्तिनी एकादशी, वामन एकादशी या डोल ग्यारस के नाम से जानी जाती है। जो साधक अपने पूर्वजन्म से लेकर वर्तमान में जाने-अजाने किये गये पापों का प्रायश्चित करना चाहते हैं और मोक्ष की कामना रखते हैं उनके लिये यह एकादशी मोक्ष देने वाली, समस्त पापों का नाश करने वाली मानी जाती है।
प्रसन्नमुद्रा में श्री विष्णु बदलते हैं करवट
मान्यता है कि इस एकादशी के व्रत से वाजपेय यज्ञ जितना पुण्य फल उपासक को मिलता है। पद्मा एकादशी को भगवान विष्णु पाताल लोक में अपनी शैय्या पर करवट बदलते हैं। शास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु करवट बदलने के समय प्रसन्नचित्त मुद्रा में रहते हैं, इस अवधि में उनसे जो कुछ भी मांगा जाता है वे अवश्य प्रदान करते हैं। इस दिन भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा की जाती है। इस व्रत को करने से व्यक्ति के सुख, सौभाग्य में वृद्धि होती है। मंदिरों में इस दिन भगवान श्री विष्णु की प्रतिमा या शालिग्राम को पालकी में बिठाकर ढोल-नगाड़ों के साथ शोभा यात्रा निकाली जाती है जिसे देखने के लिए लोग उमड़ पड़ते हैं।
Parivartini Ekadashi 2020: परिवर्तिनी एकादशी आज, इस दिन भूलकर भी न करें ये पांच काम
श्री हरि के वामन अवतार की करें पूजा
परिवर्तिनी एकादशी के दिन सुबह उठकर स्नान करें और पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण कर पूर्व या पूर्वोत्तर की ओर मुख करके भगवान विष्णु की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान करवाकर वस्त्र,आभूषण,फूलमाला आदि धारण कराएं। यदि मूर्ति नहीं है तो आप भगवान विष्णु का चित्र भी लगा कर पूजा कर सकते हैं। इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार का ध्यान कर पूजा करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। पूजा के उपरांत वामन भगवान की कथा का श्रवण या वाचन करें और कपूर एवं शुद्ध घी के दीपक से श्री हरि की आरती उतारें एवं प्रसाद सभी में वितरित करें। भगवान विष्णु के पंचाक्षर मंत्र ‘‘ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय’’का यथा संभव तुलसी की माला से जाप करें। इसके बाद शाम के समय जल में निवास करने वाले श्री नारायण की पुनः संध्या आरती करके उनकी मूर्ति के समक्ष भजन-कीर्तन अवश्य करें। इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु सहित देवी लक्ष्मी की पूजा करने से इस जीवन में धन और सुख की प्राप्ति तो होती ही है। परलोक में भी इस एकादशी के पुण्य से उत्तम स्थान मिलता है। पद्मा एकादशी के दिन जल से भरे हुए घड़े को वस्त्र से ढककर दही और चावल के साथ ब्राह्मण को दान देना चाहिए,शुभ फलों की प्राप्ति के लिए साथ में जूते और छाते का भी दान करें । जो लोग किसी कारण वश पद्मा एकादशी का व्रत नहीं कर पाते हैं उन्हें पद्मा एकादशी के दिन भगवान विष्णु के नाम का कीर्तन करना चाहिए।
परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा
त्रेतायुग में बलि नामक एक असुर राजा था, लेकिन वह महादानी एवं भगवान श्री विष्णु का बहुत भक्त था।वैदिक विधियों के साथ वह भगवान् का नित्य पूजन किया करता था,उसके द्वार से कभी कोई खाली हाथ नहीं लौटता था। अपने वामनावतार में भगवान विष्णु ने राजा बलि की परीक्षा ली थी। राजा बलि ने तीनों लोकों पर अपना अधिकार कर लिया था लेकिन उसमें एक गुण यह था कि वह किसी भी ब्राह्मण को खाली हाथ नहीं भेजता था उसे दान अवश्य देता था। दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने उसे भगवान विष्णु की लीला से अवगत भी करवाया लेकिन फिर भी राजा बलि ने वामन स्वरूप भगवान विष्णु को तीन पग भूमि देने का वचन दे दिया। फिर क्या था दो पगों में ही भगवान विष्णु ने समस्त लोकों को नाप दिया तीसरे पग के लिये कुछ नहीं बचा तो बलि ने अपना वचन पूरा करते हुए अपना शीष उनके पग के नीचे कर दिया। भगवान विष्णु की कृपा से बलि रसातल में पाताल लोक में रहने लगा लेकिन साथ ही उसने भगवान विष्णु को भी अपने यहां रहने के लिये वचनबद्ध कर लिया था।वामन अवतार की इस कथा को सुनने और पड़ने वाला व्यक्ति तीनों लोकों में पूजित होता है ।