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पापमोचनी एकादशी: भगवान विष्णु की इस दिन पूजा करने से सारे पाप हो जाते हैं नष्ट

Sun, 11 Mar 2018 03:17 PM IST
धर्म डेस्क, अमर उजाला
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हिन्दू शास्त्रों में एकादशी व्रत का विशेष महत्व होता है। साल में 24 एकादशी होती है। चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को पापमोचनी एकादशी कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन जो मनुष्य भक्ति भाव से जो व्रत रखता है उसके सारे पापों का नाश होता है। इस बार यह एकादशी 13 मार्च को पड़ रही है। यह एकादशी पापों को नष्ट करने वाली एकादशी मानी जाती है। इस एकादशी को व्रत रखने वाला मनुष्य मोक्ष के द्वार खुल जाते हैं। इस एकादशी के महत्व को भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया था। इस एकादशी के महत्व को भगवान श्रीकृष्ण ने बताते हुए कहा कि जो भी कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत रखता है उसके सारे पाप नष्ट हो जाते है। इस एकादशी के दिन भक्त को भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। ऐसा करने से भगवान विष्णु का आशीर्वाद मिलता है।

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पापमोचिनी एकादशी व्रत कथा 
एक बार एक ऋषि कठोर तपस्या में लीन थे। उनकी तपस्या के प्रभाव देवराज इन्द्र घबरा गए। ऋषि की तपस्या भंग करने के लिए इन्द्र ने मंजुघोषा नामक अप्सरा को भेजा। मेधावी ऋषि अप्सरा के हाव-भाव को देखकर उस पर मुग्ध हो गए। मेधावी ऋषि शिव भक्ति छोड़कर मंजुघोषा के साथ रहने लगे। कई साल गुजर जाने पर मंजुघोषा ने ऋषि से स्वर्ग वापस जाने की आज्ञा मांगी। ऋषि को तब भक्ति मार्ग से हटने का बोध हुआ और अपने आप पर ग्लानि होने लगी। 

धर्म भ्रष्ट होने का कारण अप्सरा को मानकर ऋषि ने अप्सरा को पिशाचिनी हो जाने का शाप दिया। अप्सरा इससे दुःखी हो गई और शाप से मुक्ति के लिए प्रार्थना करने लगी। इसी समय देवर्षि नारद वहां आये और अप्सरा एवं ऋषि दोनों को पाप से मुक्ति के लिए पापमोचिनी एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। नारद द्वारा बताये गये विधि-विधान से दोनों ने पाप मोचिनी एकादशी का व्रत किया जिससे वह पाप मुक्त हो गये। शास्त्रों में बताया गया है कि एकादशी की इस कथा को पढ़ने और सुनने से सहस्र गौदान का फल मिलता है। ब्रह्महत्या, सोने की चोरी और सुरापान करनेवाले महापापी भी इस व्रत से पापमुक्त हो जाते हैं। यह व्रत बहुत पुण्यदायी है।

व्रत के नियम
एकादशी के दिन प्रातः स्नानादि से निवृत होकर भगवान विष्णु की पूजा करें। घी का दीपक जलाकर भगवान से जाने-अनजाने जो भी पाप हुए हैं उससे मुक्ति पाने के लिए प्रार्थना करें। जितना अधिक संभव हो 'ओम नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जप करें।
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