व्रतों में निर्जला एकादशी का व्रत सबसे ज्यादा कठिन माना जाता है। वर्ष में एक बार ग्रीष्म ऋतु के घोर तपते दिनों में किया जाने वाला उपवास, जिसमें पानी भी नहीं पिया जाए, निर्जल उपवास है। एकादशी दो तरह की है- विद्धा और शुद्धा। सूर्योदय के समय, दशमी तिथि होने पर एकादशी विद्धा और दशमी से रहित एकादशी हो तो शुद्धा एकादशी होती है। उपवास के लिए दशमी से युक्त एकादशी का व्रत करने की मनाही है।
व्यास जी की आज्ञा अनुसार भीमसेन ने यह व्रत किया
भगवान विष्णु
इस एकादशी से वर्ष की 24 एकादशियों के व्रत के समान फल मिलता है। यह व्रत करने के पश्चात द्वादशी तिथि में ब्रह्मा बेला में उठकर स्नान,दान तथा ब्राह्माण को भोजन कराना चाहिए। वासुदेवाय मंत्र के जप के साथ दान करने का विधान भी है। निर्जला एकादशी की कथा महाभारत के प्रसंग से जुड़ी है। एक बार भीमसेन की कुछ जिज्ञासा के बाद व्यासजी ने कहा, हे भीम अगर तुम स्वर्गलोक जाना चाहते हो, तो दोनों एकादशियों का व्रत बिना भोजन ग्रहण किए करो, क्योंकि ज्येष्ठ मास की एकादशी का निर्जल व्रत करना विशेष शुभ कहा गया है। इस व्रत में आचमन में जल ग्रहण कर सकते है। अन्नाहार करने से व्रत खंडित हो जाता है। व्यास जी की आज्ञा अनुसार भीमसेन ने यह व्रत किया और वे पाप मुक्त हो गए।
निर्जला एकादशी व्रत के नियम
भगवान विष्णु
मिथुन संक्रान्ति के मध्य ज्येष्ठ मास की शुक्लपक्ष की एकादशी को निर्जल व्रत किया जाता है। सूर्योदय से व्रत का आरंभ हो जाता है। इस व्रत में द्वादशी के दिन सूर्योदय से पहले ही उठना चाहिए। इस एकादशी का व्रत करना सभी तीर्थों में स्नान करने के समान माना गया है। निर्जला एकादशी का व्रत करने से मनुष्य सभी पापों से मुक्ति पाता है।
उपवास की विधि
भगवान विष्णु
उपवास की विधि बहुत सामान्य है , लेकिन अनुशासन बहुत कठिन। विधि के तौर पर प्रथम भगवान का पूजन, फिर गौदान, ब्राह्मणों को मिष्ठान्न व दक्षिणा देनी चाहिए तथा जल से भरे कलश का दान अवश्य करना चाहिए। निर्जला के दिन अन्न, वस्त्र, उपाहन (जूती) आदि का दान भी करना चाहिए। लेकिन जरूरी उपवास है। बिना पानी और भोजन के किए गए उपवास से प्रकृति भी किन्हीं अंशों में समृद्ध होती है। कुछ नहीं तो व्यक्ति को प्रकृति के साधनों का उपयोग करने की सीख तो मिलती है।