उपवास शरीर और मस्तिष्क को सत्व की स्थिति में रखने की एक कोशिश है। यह कोशिश एक दिन से एक महीने, साल या किसी भी अवधि के लिए हो सकती है। इसमें मूल बात है समर्पण और अनुशासन। उपवास के दौरान बीच में कुछ खाया जा सकता है, जैसे- फलाहार या दिन में एक समय भोजन। इसका उद्देश्य खुद को अनुशासन में रखना और संकल्प शक्ति का विकास करना है। गीता के अनुसार, मांस, अंडे, खट्टे और तले हुए या संरक्षित पदार्थ राजसी-तामसी प्रवृतियों को बढ़ावा देते हैं। इसलिए उपवास के दौरान इनका सेवन नहीं करना चाहिए। उपवास के दौरान किए जाने वाले अनुष्ठानों का भी व्यापक अभिप्राय है। डॉ. के. के. अग्रवाल के अनुसार, इस तरह के अनुष्ठानों से शरीर में पैदा होने वाले विषैले पदार्थों के प्रभाव समाप्त होते हैं। इस दौरान शारीरिक शुद्धि के लिए तुलसी जल, अदरक का पानी या फिर अंगूर ग्रहण किया जा सकता है। जबकि मानसिक शुद्धि के लिए जप, ध्यान, सत्संग, दान और धार्मिक सभाओं में भाग लेना चाहिए।