हिंदू पंचांग के अनुसार, वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को भगवान विष्णु ने अपने चौथे अवतार नृसिंह रूप में प्रकट होकर भक्त प्रह्लाद की रक्षा की थी और हिरण्यकश्यप का वध किया था। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह तिथि अधर्म पर धर्म की विजय और भक्ति की शक्ति का प्रतीक है।
नृसिंह जयंती का महत्व
भगवान नृसिंह का अवतार विष्णु के दशावतारों में अत्यंत प्रभावशाली और रौद्र रूप माना जाता है। वे आधे मनुष्य और आधे सिंह के स्वरूप में प्रकट हुए थे। उनका यह रूप दर्शाता है कि जब भक्त की परीक्षा कठिनतम स्थिति में होती है, तब भगवान स्वयं आकर उसकी रक्षा करते हैं। नृसिंह जयंती पर भगवान विष्णु के इस रूप की उपासना करने से भय, क्रोध, रोग, बाधाएं और शत्रु नष्ट होते हैं। यह दिन विशेष रूप से भक्तों की रक्षा, शक्ति, साहस और सत्य के प्रतीक के रूप में पूजा जाता है।
पूजा विधि
नृसिंह जयंती की पूजा सांयकाल के समय करने का विधान है। पूजा में शुद्ध घी का दीपक जलाया जाता है और पंचामृत से दैत्यसूदन भगवान नृसिंह को स्नान कराया जाता है। फिर वस्त्र, फूल, चंदन, धूप, दीप, नैवेद्य आदि अर्पित किए जाते हैं।भगवान नृसिंह के मंत्र ऊं नरसिंहाय वरप्रदाय नम: मंत्र का जाप करें।इस दिन गरीब लोगों को गर्मी से राहत देने वाली ठंडी चीजें दान में दें। इस दिन नृसिंह स्तोत्र, नृसिंह कवच और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना अत्यंत पुण्यदायक माना जाता है। रात्रि को जागरण करके भगवान नृसिंह की कथा सुनना और उनके मंत्रों का जाप करना विशेष फलदायक होता है। व्रत करने वाले दिनभर उपवास रखकर संध्या के समय पूजा कर प्रसाद ग्रहण करते हैं।
पौराणिक कथा
पुराणों के अनुसार, हिरण्यकश्यप एक अत्याचारी असुर था जिसे ब्रह्माजी से यह वरदान प्राप्त था कि वह न किसी मनुष्य द्वारा मरेगा, न किसी पशु द्वारा, न दिन में मरेगा न रात में, न भीतर मरेगा न बाहर, न शस्त्र से न अस्त्र से। इसी अभिमान में उसने स्वयं को भगवान घोषित कर दिया और अपने पुत्र प्रह्लाद को भी अपने जैसी सोच अपनाने के लिए बाध्य किया। लेकिन प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। जब हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को कई बार मारने की कोशिश की, तब भी विष्णु ने उसकी रक्षा की। अंत में, वह अपने पुत्र को स्वयं मारने चला गया और स्तंभ की ओर इशारा कर पूछा “क्या तेरा विष्णु इस स्तंभ में है?” प्रह्लाद ने कहा “हां, भगवान हर जगह हैं।” जैसे ही हिरण्यकश्यप ने स्तंभ को तोड़ा, उसमें से भगवान विष्णु नरसिंह रूप में प्रकट हुए। उन्होंने सांध्यकाल के समय, एक द्वार की चौखट पर, अपने नाखूनों से हिरण्यकश्यप का वध किया।
पूजन मंत्र-
ॐ उग्रवीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखं ।
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्यु मृत्युं नमाम्यहम् ॥