धर्म ग्रंथों में वर्णित है कि पूर्व कल्प में नारद 'उपबर्हण' नाम के एक गन्धर्व थे। एक बार प्रजापति ब्रह्माजी ने उपबर्हण को उनके अशिष्ट आचरण के कारण शूद्र योनि में जन्म लेने का श्राप दे दिया। श्राप के फलस्वरूप वह 'शूद्रादासी' के पुत्र हुए। बाल्यकाल से ही साधु-संतों के साथ रहने के कारण इस बालक के चित्त में रजोगुण और तमोगुण को नाश करने वाली भक्ति का प्रादुर्भाव हो गया।निरंतर श्री नारायण की भक्ति करते हुए उन्हें एक दिन भगवान की एक झलक विद्युत् रेखा की भांति दिखाई दी और तत्काल ही अदृश्य हो गई।यह बालक नारायण के उस स्वरुप को ह्रदय में समाहित करके बार-बार दर्शन करने की चेष्टा करने लगा,परन्तु उसे पुनः नहीं देख सका।
इतने में अदृश्य शक्ति की आवाज़ सुनाई दी-''हे दासीपुत्र !अब इस जन्म में फिर तुम्हें मेरा दर्शन नहीं होगा,अगले जन्म में तुम मेरे पार्षद हो जाओगे''। समय बीतने पर बालक का शरीर छूट गया और कल्प के अंत में जिस समय भगवान नारायण एकार्णव (प्रलयकालीन समुद्र) के जल में शयन करते हैं उस समय उनके ह्रदय में शयन करने की इच्छा से सारी सृष्टि को समेटकर ब्रह्माजी जब प्रवेश करने लगे,तब उनके श्वास के साथ दासीपुत्र की आत्मा भी श्री हरि के हृदय में प्रवेश कर गई।एक सहस्त्र चतुर्युगी बीत जाने पर ब्रह्मा जागे और उन्होंने सृष्टि करने की इच्छा की,तब उनकी इन्द्रियों से मरीचि आदि ऋषियों के साथ मानस पुत्र के रूप में नारदजी अवतीर्ण हुए और ब्रह्माजी के मानस पुत्र कहलाए।।तभी से श्री नारायण के वरदान से नारद मुनि वैकुण्ठ सहित तीनों लोकों में बिना किसी रोक-टोक के विचरण करने लगे।इन्हें अजर-अमर माना गया है। स्वर ब्रह्म से विभूषित भगवान विष्णु की दी हुई इनकी वीणा भगवन जप 'महती' के नाम से जानी जाती है,उससे श्रीमन नारायण-नारायण की ध्वनि निकलती है।माना जाता है कि वीणा पर तान छेड़कर प्रभु की लीलाओं का गान करते हुए ये ब्रह्ममुहूर्त में सभी जीवों की गति देखते हैं।
रामायण के एक प्रसंग के अनुसार नारद मुनि के श्राप के कारण ही त्रेता युग में भगवान राम को सीता जी से वियोग सहना पड़ा था। कथा के अनुसार देवर्षि नारद को अहंकार हो गया था कि उनकी नारायण भक्ति और ब्रह्मचर्य को कामदेव भी भंग नहीं कर सके।तब भगवान विष्णु ने उनका अहंकार दूर करने के लिए अपनी माया से एक सुन्दर नगर का निर्माण किया। यहाँ राजकुमारी के स्वयंवर का आयोजन किया जा रहा था तभी नारद मुनि भी वहां पहुँच गए और राजकुमारी को देखते ही उस पर मोहित हो गए। नारद जी के मन में उस राजकुमारी से विवाह करने की इच्छा जाग्रत हो गई इसलिए उन्होंने भगवान विष्णु से उनके जैसा सुन्दर रूप माँगा।
नारद भगवान विष्णु से सुन्दर रूप लेकर राजकुमारी के स्वयंवर में पहुंचे लेकिन वहां पहुँचते ही उनका मुख बन्दर जैसा हो गया। ऐसा रूप देखकर राजकुमारी को नारदमुनि पर बहुत क्रोध आया और तत्पश्चात भगवान विष्णु राजा के रूप में आए और राजकुमारी को लेकर चले गए।नारद जी को जब पूरी बात पता हुई तो उन्हें बहुत क्रोध आया।नारद जी भगवान विष्णु के पास गए और श्राप दिया कि जिस तरह आज मैं स्त्री के लिए व्याकुल हो रहा हूँ,उसी प्रकार मनुष्य जन्म लेकर आपको भी स्त्री वियोग सहना पड़ेगा।माया का प्रभाव हटने पर नारद जी को बहुत दुःख हुआ उन्होंने भगवान से क्षमा-याचना की लेकिन तब भगवान विष्णु ने उन्हें समझाया कि यह सब माया का प्रभाव था इसमें आपका कोई दोष नहीं है।