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Makar Sankranti 2019 : मकर संक्रांति पर क्यों खाते हैं तिल और खिचड़ी

Fri, 11 Jan 2019 01:27 PM IST
Amit Saini धर्म डेस्क, अमर उजाला
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मकर संक्रांति 2019
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मकर संक्रांति का त्योहार हर साल 14 जनवरी 2019 को मनाया जाता है लेकिन इस पर यह पर्व 15 जनवरी है। यह त्योहार पूरे भारत में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। मकर संक्रांति के दिन प्रातः स्नान, दान और तिल का सेवन करने का महत्व है। इस दिन लोग नए चावल से बनी खिचड़ी और तिल से बनी चीज जरूर खाते हैं आइए जानते हैं आखिर इस दिन क्यों खाते हैं तिल और खिचड़ी।
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शनि ने दिया था पिता को शाप
मकर संक्रांति के अवसर पर तिल के दान और तिल से बनी चीजों को खाने की परंपरा के पीछे क्या कारण है इसका उल्लेख  श्रीमद्भागवत और देवी पुराण में मिलता है। शनिदेव का अपने पिता से वैर भाव था क्योंकि सूर्य देव ने शनि की माता छाया को अपनी दूसरी पत्नी संज्ञा के पुत्र यमराज से भेद-भाव करते देख लिया था इससे नाराज होकर सूर्य देव ने संज्ञा और उनके पुत्र शनि को अपने से अलग कर दिया था। इससे शनि और छाया ने सूर्य देव को कुष्ठ रोग का शाप दे दिया।

शनि को भी मिला शाप
पिता सूर्यदेव को कुष्ट रोग से पीड़ित देखकर यमराज ने तपस्या की और सूर्यदेव को कुष्ठ रोग से मुक्त करवाया। लेकिन इसके बाद सूर्य ने क्रोधित होकर शनि देव के घर कुंभ जिसे शनि की राशि कहा जाता है उसे जला दिया। इससे शनि और उनकी माता छाया को कष्ट भोगना पड़ रहा था। यमराज ने अपनी सौतली माता और भाई शनि को कष्ट में देखकर उनके कल्याण के लिए पिता सूर्य को काफी समझाया तब जाकर सूर्य देव शनि के घर कुंभ में पहुंचे। कुंभ राशि में सब कुछ जला हुआ था। उस समय शनि देव के पास तिल के अलावा कुछ नहीं था इसलिए उन्होंने काले तिल से सूर्य देव की पूजा की।
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शनि की पूजा से प्रसन्न होकर सूर्य देव ने शनिदेव को आशीर्वाद दिया कि शनि का दूसरा घर मकर राशि में मेरे आगमन पर धन धान्य से भर जाएगा। तिल के कारण ही शनि को उनका वैभव फिर से प्राप्त हुआ था इसलिए शनि देव को तिल बहुत  प्रिय है। इसी समय से मकर संक्राति पर तिल से सूर्य एवं शनि की पूजा का नियम शुरू हुआ।

खिचड़ी दान और खाने की धार्मिक परंपरा
मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी दान और खाने की परंपरा के पीछे भगवान शिव के अवतार कहे जाने वाले बाबा गोरखनाथ की कहानी है। खिलजी के आक्रमण के समय नाथ योगियों को खिलजी से संघर्ष के कारण भोजन बनाने का समय नहीं मिल पाता था। इससे योगी अक्सर भूखे रह जाते थे और कमजोर हो रहे थे। इस समस्या का हल निकालने के लिए बाबा गोरखनाथ ने दाल, चावल और सब्जी को एक साथ पकाने की सलाह दी। यह व्यंजन काफी पौष्टिक और स्वादिष्ट था। इससे शरीर को तुरंत उर्जा मिलती थी। नाथ योगियों को यह व्यंजन काफी पसंद आया। बाबा गोरखनाथ ने इस व्यंजन का नाम खिचड़ी रखा। गोरखपुर स्थिति बाबा गोरखनाथ के मंदिर के पास मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी मेला आरंभ होता है। कई दिनों तक चलने वाले इस मेले में बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी का भोग लगाया जाता है और इसे भी प्रसाद रूप में वितरित किया जाता है।

खिचड़ी दान और भोजन के पीछे एक दूसरा कारण यह है कि संक्रांति के समय नया चावल तैयार हो जाता है। माना जाता है कि सूर्य देव ही सभी अन्न को पकाते हैं और उन्हें पोषित करते हैं इसलिए आभार व्यक्त करने के लिए सूर्य देव को गुड़ से बनी खीर या खिचड़ी अर्पित करते हैं। वैसे मकर संक्रांति के दिन बनाई जाने वाली खिचड़ी में उड़द का दाल प्रयोग किया जाता है जो शनि से संबंधित है। कहते हैं इस दिन विशेष खिचड़ी को खाने से शनि का कोप दूर होता है। इसलिए खिचड़ी खाने की परंपरा है।

वैज्ञानिक मान्यता 
वैज्ञानिक नजरिए से मकर संक्रांति पर तिल का सेवन सेहत के लिए काफी फायदेमंद माना गया है। दरअसल सर्दियों के मौसम में शरीर का तापमान गिर जाता है। तिल और गुड़ खाने से शरीर गर्म रहता है।
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