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नवरात्रि 2018 : देवी के इस तप से बढ़ता है साधक का तेज और प्रताप

Mon, 15 Oct 2018 11:01 AM IST
डॉ. प्रणव पण्ड्या
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navratri 2018
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आश्विन नवरात्रि के दौरान तपश्चर्या का विशेष महत्त्व है। इन दिनों साधक द्वारा की गयी तपश्चर्या का फल अन्य दिनों में की गयी तप से ज्यादा लाभकारी होता है। कहा जाता है कि नवरात्र में शक्ति स्वरूपा देवी मां अपना आशीर्वाद का द्वार खोल देती है। जो साधक मनोयोगपूर्वक तपश्चर्या करता है, उन पर देवी मां अपना स्नेह व आशीष सहज ही लुटाती हैं। जिस तरह गाय के थन में दूध भरा हो, तो वह स्वयं अपने बछड़े को दूध पिलाने के लिए आतुर दिखाई देती है, उसी तरह इन दिनों सर्वशक्तिमान माता अपना संरक्षण अपने साधकों के प्रति लुटाती हैं।

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ईश्वर का मिलता है आशीर्वाद
ईश्वर तपस्वी पर प्रसन्न होता है और उसे ही अभीष्ट आशीर्वाद देता है। जो धनी, सुन्दर स्वस्थ्य, विद्वान, प्रतिभाशाली, नेता, अधिकारी आदि के रूप में चमक रहे हैं, उनकी चमक वर्तमान या पिछले तप के ऊपर ही अवलंबित है। यदि वे नया तप नहीं करते और पुरानी तपश्चर्या की पूंजी को खर्च कर रहे हैं, तो उनकी चमक पूर्व पूंजी चुकाते ही धुंधली हो जायेगी। इसलिए आगे अपना प्रभाव बनाये रखना या अपनी शक्ति को स्थाई रूप देना हो, तो तप सतत करते रहना चाहिए।

तपश्चर्या का महत्त्व
प्राचीनकाल में तपश्चर्या को बड़ा महत्त्व दिया जाता था। जो व्यक्ति जितना परिश्रमी, साहसी, पुरुषार्थी एवं क्रियाशील होता था, उसकी उतनी ही प्रतिष्ठा होती थी। गरीब, अमीर, राजा-महाराजा सभी के बालक गुरुकुलों में भेजे जाते थे ताकि वे कठोर जीवन की शिक्षा प्राप्त करके अपने को इतना सुदृढ़ बना लें कि आपत्तिग्रों से लड़ना और संपत्ति को प्राप्त करना सुगम हो सके।
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तपश्चचर्या में अन्नमय कोश
तपश्चर्या में अन्नमय कोश का विशेष स्थान है। इसके लिए समय-समय पर व्रत, उपवास करते रहना चाहिए। जिससे अन्नमय कोश को स्वस्थ रखा जा सके। तपश्चर्या छोड़ देने पर आत्मा भी अशक्त, निस्तेज एवं विकारग्रस्त हो जाती है। आलसी और आरामतलब शरीर में अन्नमय कोश की स्वस्थता स्थिर नहीं रह सकती। इसलिए उपवास, तत्त्वशुद्धि के साथ ही तपश्चर्या को प्रथम कोश की सुव्यवस्था का आवश्यक अंग बताया गया है।

आत्मबल की वृद्धि
जो लोग आज अभावग्रस्त हैं, उनके विकास का एकमात्र मार्ग है- तप। बिना तप के कोई भी सिद्धि, कोई भी सफलता नहीं मिल सकती। न सांसारिक और न ही आत्मिक। कल्याण की ताली तप की तिजोरी में रखी है। जो उसे खोलेगा, वही अभीष्ट वस्तु पायेगा। सांसारिक विकास के लिए तदनुसार मेहनत से ऊंचा उठा जा सकता है और व आध्यात्मिक तप से ही आत्मबल की वृद्धि संभव है।

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