पौराणिक कथा के अनुसार, कहा जाता है कि एकबार एक बार भगवान विष्णु जी और ब्रह्मा जी के बीच यह बहस हो गयी कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है। यह विवाद इतना बढ़ गया कि सभी देवतागण घबरा गए कि अब प्रलय होने वाला है। इस विकट समस्या का समाधान पाने के लिए सभी देवगण भगवान शिव के पास पहुंचे। तब भगवान शिव ने एक सभा का आयोजन किया और भगवान शिव ने इस सभा में सभी ज्ञानी, ऋषि-मुनि, सिद्ध महात्माओं को आमंत्रित किया। इसके साथ ही साथ ही इस सभा में विष्णु जी और ब्रह्मा जी सम्मिलित हुए।
सभा में लिए गए निर्णय को भगवान विष्णु जी ने सहर्ष स्वीकार कर लिया, लेकिन ब्रह्मा जी फैसले से संतुष्ट नहीं हुए और वे महादेव का अपमान करने लगे। ब्रह्माजी ने भगवान शिव की निंदा की जिसके चलते भगवान शिव क्रोधित हो गए। तब भोलेनाथ ने अपने रौद्र रूप से काल भैरव को अवतरित किया। काल भैरव ने भगवान के अपमान का बदला लेने के लिए अपने नाखून से ब्रह्माजी के उस सिर को काट दिया जिससे उन्होंने भगवान शिव की निंदा की थी। इस कारण से उन पर ब्रह्रा हत्या का पाप लग गया।
ब्रह्रा हत्या के पाप से मुक्ति के लिए भगवान शंकर ने काल भैरव को पृथ्वी पर जाकर प्रायश्चित करने को कहा और बताया कि जब ब्रह्रमा जी का कटा हुआ सिर हाथ से गिर जाएगा तब जाकर तुम्हें ब्रह्रा हत्या के पाप से मुक्ति मिल जाएगी। अंत में जाकर काशी में काल भैरव की यात्रा समाप्त हुई थी। फिर यहीं पर वे स्थापित हो गए और काशी के कोतवाल बन गए।