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Janki Jayanti 2021 Date: कब है जानकी जयंती, जानें तिथि, मुहूर्त, महत्व और कथा

Mon, 01 Mar 2021 07:03 AM IST
रुस्तम राणा धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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जानकी जयंती 2021 - फोटो : social media
जानकी जयंती मां सीता माता का जन्मोत्सव है। माता सीता को जानकी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि फाल्गुन माह कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को राजा जनक की पुत्री और भगवान श्रीराम की पत्नि माता सीता का प्राकट्य हुआ था। इस पर्व को सीता अष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। माता सीता अपने त्याग एवं समर्पण के लिए पूजनीय हैं। इस पावन उत्सव पर माता सीता की पूजा की जाती है एवं व्रत उपवास रखा जाता है। आइए जानते हैं जानकी जयंती की तिथि मुहूर्त और व्रत विधि-
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जानकी जयंती 2021 - फोटो : social media
कब है जानकी जयंती 2021 (Janki Jayanti 2021 Date)
इस साल जानकी जयंती 6 मार्च शनिवार के दिन पड़ रही है।
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जानकी जयंती 2021 - फोटो : social media
जानकी नवमी 2020 का मुहूर्त
अष्टमी तिथि का प्रारंभ- 05 मार्च को शाम 07 बजकर 54 मिनट पर।
अष्टमी तिथि का समापन- 06 मार्च शनिवार को शाम 06 बजकर 10 मिनट पर।
उदय तिथि- 06 मार्च 2021

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भगवान राम और माता सीता - फोटो : social media
जानकी जयंती व्रत विधि
  • सुबह स्नान करने के घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करें।
  • दीप प्रज्वलित करने के बाद व्रत का संकल्प लें।
  • मंदिर में देवताओं को स्नान करवाएं। 
  • अगर घर में गंगा जल है तो, देवताओं को स्नान वाले जल में गंगा जल मिलाएं।
  • भगवान राम और माता सीता का ध्यान करें। 
  • शाम को माता सीता की आरती के साथ व्रत खोलें।
  • भगवान राम और माता सीता को भोग लगाएं। 
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जानकी जयंती 2021 - फोटो : सोशल मीडिया
जानकी जयंती का महत्व
इस दिन को माता सीता के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। सुहागिन स्त्रियां अपने घर की सुख शांति और अपने पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं। जानकी जयंती पर मंदिरों में भगवान श्री राम और माता सीता की पूजा के लिए भक्तों का तांता लग जाता है। इस दिन जो भी व्यक्ति भगवान श्री राम और माता सीता की पूजा करता है उसे सोलह महा दान का फल और पृथ्वी दान का फल प्राप्त होता है। जानकी जंयती का व्रत सौभाग्यशाली स्त्रियां अपने पति की लंबी आयु के लिए रखती हैं। 
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जानकी जयंती 2021 - फोटो : सोशल मीडिया
माता सीता की जन्म कथा
वाल्मिकी रामायण के अनुसार, एक बार मिथिला में पड़े भयंकर सूखे से राजा जनक बेहद परेशान हो गए थे, तब इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए उन्हें एक ऋषि ने यज्ञ करने और धरती पर हल चलाने का सुझाव दिया। ऋषि के सुझाव पर राजा जनक ने यज्ञ करवाया और उसके बाद राजा जनक धरती जोतने लगे। तभी उन्हें धरती में से सोने की खूबसूरत संदूक में एक सुंदर कन्या मिली। राजा जनक की कोई संतान नहीं थी, इसलिए उस कन्या को हाथों में लेकर उन्हें पिता प्रेम की अनुभूति हुई। राजा जनक ने उस कन्या को सीता नाम दिया और उसे अपनी पुत्री के रूप में अपना लिया।

माता सीता का विवाह भगवान श्रीराम के साथ हुआ। लेकिन विवाह के पश्चात वे राजसुख से वंचित रहीं। विवाह के तुरंत बाद 14 वर्षों का वनवास और फिर वनवास में उनका रावण के द्वारा अपहरहण हुआ। लंका विजय के बाद जब वे अपने प्रभु श्रीराम के साथ अयोध्या वापस लौटीं तो उनके चरित्र पर सवाल उठाए गए। यहां तक कि उन्हें अग्नि परीक्षा भी देनी पड़ी, परंतु फिर भी उनके भाग्य में वो सुख नहीं मिल पाया, जिसकी वे हकदार थीं। उन्हें अयोध्या से बाहर छोड़ दिया गया। जंगल में रहकर उन्होंने लव-कुश को जन्म दिया और अकेले ही उनका पालन-पोषण किया। अंत में मां जानकी धरती मां के भीतर समा गईं। सनातन संस्कृति में माता सीता अपने त्याग एवं समर्पण के लिए सदा के लिए अमर हो गईं। 
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