आश्विन नवरात्र गर्मी के जाने व ठंडी के आने की संधिबेला है। ऐसे ऋतु परिवर्तन के समय ईश्वर के समीप बढ़ने से आत्मा के प्रति परमात्मा की जो सन्देश ध्वनियां आती हैं, उन्हें मन और वाणी से मौन होकर ही सुना जा सकता है। नवरात्रि मुख्यतः साधना का महापर्व है और इन दिनों चुप रहकर, अंतर्मुखी होकर साधक परमात्मा के प्रकाश को ग्रहण कर सकता है।
ईश्वरीय कृपा मौन रहने से मिलती है
एक बार ऋषि भाष्कलि ने अपने आचार्य से पूछा- ‘भगवान् ब्रह्मा को कैसे प्राप्त किया जा सकता है? आचार्य ने कोई उत्तर न दिया। भाष्कलि ने सात बार यह प्रश्न पूछा कि आचार्य सातों बार चुप रहे। अन्त में उनने कहा- भद्रे! मैं बार-बार उत्तर दे रहा हूं, पर तू समझता ही नहीं। उस ब्रह्म को वाणी से कहा, सुना नहीं जा सकता, उसे तो मौन होकर ही समझा और प्राप्त किया जा सकता है।
वाक् ब्रह्मचर्य से मिलती है शक्ति
ब्रह्मचर्य वीर्य संचय को ही नहीं, वरन् शक्तियों के क्षरण को रोकना ब्रह्मचर्य है। वाणी का संयम ‘वाक् ब्रह्मचर्य’ कहलाता है। जिस प्रकार वीर्य के अपव्यय से रोग, जरा और अकाल मृत्यु की गोद में जाना पड़ता है वैसे ही वाणी का दुरुपयोग, अपव्यय करने पर मानसिक शक्तियों की न्यूनता होती जाती है। बकवास में जितकी शक्तियां अधिक खर्च हो जाती हैं। उससे महान कार्य करते समय कमी पड़ जाती है। संसार में जितने भी रचनात्मक कार्य करने वाले महापुरुष, वैज्ञानिक ग्रन्थकार, सेनापति व महात्मा हुए हैं वे सभी प्रायः मितभाषी रहे। शक्ति के साधकों को मौन रहना चाहिए।
रखे चारों वाणियों में संयम
योग शास्त्रों में चार वाणी बताई हैं- परावाणी, पश्यन्ति वाणी, मध्यमा वाणी और वैखरी वाणी। इनमें से परा और पश्यन्ति सूक्ष्म तथा मध्यमा और वैखरी स्थूल हैं। मन में जो संकल्प उठते हैं, जो सोच विचार ऊहापोह, तर्क-वितर्क होते हैं। उनमें सूक्ष्म वाणी का प्रयोग होता है। मध्यमा वाणी कन्ठ में और वैखरी जिव्हा में रहती है। घुस पुस, अस्पष्ट, वाणी कन्ठ से और स्पष्ट ध्वनि वाली वाणी जिव्हा से उत्पन्न होती है। इन चारों वाणियों का हमें संयम एवं सदुपयोग करना चाहिए। कई ग्रंथों में कहा गया कि लोकहित, परमार्थ की दृष्टि से जो कुछ कहा जाता है वह मौन समान है। निष्प्रयोजन फिजूल बातों से बचना मौन का प्रधान उद्देश्य है।
मौन साधना से मिलता है ज्यादा फल
वैसे तो मौन रहकर नवरात्र साधना करनी चाहिए, इससे साधना का फल ज्यादा प्राप्त होता है। इससे आंतरिक ऊर्जा बढ़ती है। चित्त में शान्ति रहती है। आत्मबल बढ़ता है। यदि ऐसा न हो पाये, तो कम से कम ४ घन्टे लगातार का होना चाहिए। मौन के समय अन्य शारीरिक कार्य न करने चाहिए। इस समय चित्त को सब ओर से हटा कर अपने इष्टदेव या प्रकाश ज्योति का ध्यान करना चाहिए।
लेखक अखिल विश्व गायत्री परिवार व देव संस्कृति विश्वविद्यालय कुलाधिपति हैं।