भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्दशी को भगवान नारायण के अनंत रूप की पूजा की जाती है। जिसे अनंत व्रत भी कहते हैं। भगवान अनंत की पूजा से प्राणियों के जीवन में पड़ने वाले दैहिक, दैविक और भौतिक तीनों तापों से मुक्ति मिल जाती है। इनकी पूजा अति शुभ फलदायी और सरल है।
पूजन विधि
इस व्रत में भक्तों को एक समय भोजन करना चाहिए और आटे, शक्कर और घी का मिला हुआ मालपुआ भगवान को समर्पित करना चाहिए। इस दिन भगवान विष्णु के रोम से उत्पन्न 14 गांठों वाली दूर्वांकुर और 14 गांठ लगा हुआ रेशम का धागा लाकर रखें। रंगे हुए चावलों से सर्वतोभद्र मंडल बनाकर उसमें तांबे का कलश रखें। कलश के उपर पीले वस्त्र रखें। पुन: भगवान अनंत की प्रतिमा स्थापित करके, विधिपूर्वक पूजन करने के साथ-साथ ही शिव, गणेश, षोडशमात्रिका एवं नवग्रह तथा लोकपाल आदि का पूजन अलग-अलग करें। इसके पश्चात हवन के साथ पूर्णाहुति दें और यथाशक्ति दान-पुण्य करें और लोगों को भोजन कराएं।
किस भुजा में बांधे अनंता
इसका विधान है कि 14 ब्राह्मणों को भोजन पकवान करवाकर उन्हें दक्षिणा सहित विदा करने से पहले रेशम के धागे को जिसका कलश के साथ पूजन किया गया हो यदि पुरुष हैं तो दाहिनी भुजा में और स्त्री हैं तो बाईं भुजा में बांधें। इस प्रकार भगवान अनंत की पूजा करके और आचार्यों को ससम्मान भोजन आदि कराकर विदा करने से व्यक्ति की अनंत कामनाएं तो पूर्ण होती ही हैं, वह भोग और मोक्ष का पूर्ण भागीदार होता है।