वसंत प्रेम का संदेश देता है। 'प्रिय' के लिए त्याग कि भावना का। अपने अहम को छोड़ देना ही तो प्रेम है। कबीर जैसे कवियों और सूफी संतों ने प्रेम और ईश्वर को एक ही कहा है। 'बीरा ये घर प्रेम का। खाला का घर नाहि, सीस उतारे, भुई धरे ,तौ पैठे घर माहि।' वसंत का स्थान मन में ही छिपा होता है। धर्म का भी यही महामंत्र है कि हर स्थिति का सामना करो, अविराम जीवन जीना यहीं तो वसंत है।
यही धर्म का शाश्वत महामंत्र भी है। सृजन की सरिता में आकंठ डूब जाना और नवनिर्माण का संकल्प भी वसंत का ही तो सूत्र संदेश है। यह सर्वव्यापी और सर्वग्राही होने कि ऋतु है, तभी तो विदेशी वेलेंटाइन संत भी इसकी सुगंध में सराबोर होकर भारतभूमि में अपनी जगह खोज रहे हैं। वसंत अपने साथ ले आता है फागुन की मस्ती, होली के गीतों की मिठास, उनसे जुड़ी राधा कृष्ण के प्रेम की अलौकिकता।
यही तो धर्म द्वारा निष्काम प्रेम का खुले मन से स्वागत है, जो कृष्ण को पूजनीय बना देता है। वसंत, 'जा तन की झाई पड़े....श्याम हरित धुति होये' का प्रतिबिम्ब ही तो है। जब पीली सरसों से भरी स्वर्णवर्णा, राधा रूपी पृथ्वी, नीले (सांवले) श्रीकृष्ण रूपी आकाश से सुदूर क्षितिज पर भावलोक में एकात्म होती है, तब इस संयोग से जो हरीतिमा जन्म लेती है, वही मन, प्राण और धर्म की संजीवनी है।