शास्त्र मत के अनुसार 13 मार्च को भद्रा के पूंछ वाले भाग में यानी 7.40 बजे के बाद होलिका का पूजन किया जा सकता है जबकि भद्रा की समाप्ति के बाद यानी रात को 10:44 के बाद होलिका दहन भद्रा समाप्ति के बाद कर सकते हैं।
Holika Dahan 2025 Bhadra Time: हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन महीने के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को होलिका दहन किया जाता है और अगले दिन रंगों वाली होली खेली जाती है जिसे धुलेंडी भी कहा जाता है। 13 मार्च 2025, गुरुवार के दिन होलिका दहन रात्रि में होगा। कई विद्वानों का मत है कि इस दिन पूजा और दहन रात्रिकाल में भद्रा के समाप्त होने के बाद करना चाहिए। इसके बाद अगले दिन होली खेली जाएगी। परंतु इस संबंध में शास्त्र क्या कहता है। आइए जानते हैं विस्तार से।
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होली और भद्रा
भद्रा के वास को लेकर शास्त्रों में कई तरह के निर्देश दिए हैं। भद्रा का वास तीनों लोकों में होता है। पाताल, धरती और आकाश। हर लोक में इसके वास का प्रभाव अलग बताया गया है। अधिकतर मत है कि यदि भद्रा का वास पृथ्वी पर हो तो पर्व-त्योहार में विशेष ध्यान रखना चाहिए। इस बार 13 मार्च को भद्रा का वास पृथ्वी पर रहेगा जो ठीक नहीं माना जा रहा है।
ऐसे में शास्त्र का मत है कि विशेष पर्वकाल के समय भद्रा पूंछ पर विचार करना चाहिए क्योंकि इसमें कई नाड़ियां होती हैं और हर नाड़ी का अलग प्रभाव होता है। इनके चौथे भाग में भद्रा का दोष मान्य नहीं माना गया है। इस शास्त्र मत के अनुसार 13 मार्च को भद्रा के पूंछ वाले भाग में यानी 7.40 बजे के बाद होलिका का पूजन किया जा सकता है जबकि भद्रा की समाप्ति के बाद यानी रात को 10:44 के बाद होलिका दहन भद्रा समाप्ति के बाद कर सकते हैं।
भद्रा का ही एक दूसरा नाम विष्टि करण भी है, जो कि 11 करणों में से एक है। एक करण तिथि के आधे भाग के बराबर होता है। इसके पूंछ भाग में पूजा की जा सकती है। यदि भद्रा मध्यरात्रि तक व्याप्त हो तो ऐसी परिस्थिति में भद्रा पूंछ के दौरान होलिका पूजन भी किया जा सकता है। हालांकि कुछ ज्योतिषी इसे मान्यता नहीं देते हैं।
उल्लेखनीय है कि उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में हमेशा की तरह सबसे पहले होलिका दहन किया जाता है। मंदिर की परंपरा अनुसार 13 मार्च को संध्या आरती के बाद शाम 7.30 बजे के बाद होलिका का पूजन होगा और उसके बाद दहन किया जाएगा। इसके बाद शहर में अन्य जगहों पर होलिका दहन होगा।