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Holi 2020: होलिका दहन, परंपरा और खास बातें, योग से लेकर शुभ मुहूर्त तक जानें सबकुछ

Mon, 09 Mar 2020 10:01 AM IST
शिखा पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
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होली 2020 - फोटो : अमर उजाला
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होलिका दहन सोमवार शाम को 6:22 बजे से रात 8:49 बजे तक होगा। भद्रा दोपहर 12:32 बजे खत्म हो जाएगी। भद्राकाल में होलिका दहन नहीं किया जाना चाहिए। परेवा यानी मंगलवार को रंग खेला जाएगा।
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इस बार में शहर में कुल 4020 स्थानों पर होलिका दहन होगा। उधर, हर समाज ने अपने रीति-रिवाज के अनुसार होली मनाने की तैयारी कर ली है। चलिए जानते हैं इस बारे में,,,

गुजराती समाज ऐसे मनाएगा त्योहार
होली का त्योहार वैसे तो सभी हर्षोल्लास से मनाते हैं पर गुजराती समाज की होली कुछ अलग अंदाज में मनाई जाती है। गुजराती समाज भी होलिका में गन्ना, उपले, चना,जौ, रोली आदि जलाते हैं। इसके बाद होलिका के सात परिक्रमा कर वापस लौट जाते हैं। गुजराती समाज के लोग सबसे पहले बड़े-बुजुर्गों के पैर छूते हैं। अबीर लगाकर आशीर्वाद लेते हैं। अगले दिन सभी रंग खेलते हैं।सिंधी महिलाएं

मांगेंगी मन्नत

होलिका दहन के दौरान सिंधी समाज की महिलाएं मन्नत मांगती हैं। जिन महिलाओं की मन्नत पूरी हो जाती है वे रेवड़ी, जलेबी और समोसा आदि व्यंजन बनाकर लातीं हैं। होलिका मइया का पूजन कर महिलाएं नृत्य भी करती हैं। परेवा वाले दिन सभी पुरुष और महिलाएं एक जगह एकत्रित होकर रंग खेलते हैं। 

जैन समाज अबीर से लगाएगा टीका
जैन समाज में रंग खेलना वर्जित है। घर के सभी सदस्य अबीर का टीकाकर होली की रस्म पूरी करते हैं। होलिका दहन में सभी जैन समाज के लोग शामिल होते हैं और गन्ना, चना, जौ, गुझिया, शक्कर, रोली, उपले के साथ लोग अपनी-अपनी लंबाई की नाप का डोरा लेकर जाते है। होलिका पूजन के बाद वापसी पर बड़ों के पैर छूकर चना देते है। साथ ही अबीर का टीका करते हैं। 

सिख मनाएंगे होला महल्ला
सिख समाज की होली परंपरागत होली से कुछ हटकर होती है। होलिका दहन के बाद अगले दिन सभी एक-दूसरे को खूब रंग लगाएंगे। शाम को चौक स्थित गुरु तेग बहादुर सिंह गुरुद्वारा में होला महल्ला का आयोजन किया जाएगा। इस मौके पर शस्त्रों का पूजन होगा। कई लोग घरों पर ही शस्त्र पूजन करेंगे।
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होली से जुड़ी कथाएं
कहा जाता है जब प्रह्लाद को नारायण भक्ति से विमुख करने के सभी उपाय निष्फल होने लगे तो हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी को बंदी बना लिया और यातनाएं देने लगा। उसे मारने के लिए रोज अनेक उपाय किए जाने लगे लेकिन भगवत भक्ति में लीन प्रहलाद हमेशा जीवित बच जाते थे। इस तरह सात दिन बीत गए। आठवें दिन भाई हिरण्यकश्यप की परेशानी देख बहन होलिका (जिसे ब्रह्मा द्वारा अग्नि से न जलने का वरदान था) ने  प्रहलाद को अपनी गोद में लेकर अग्नि में भस्म करने का प्रस्ताव रखा।

होलिका जैसे ही भतीजे प्रह्लाद को गोद में लेकर जलती आग में बैठी तो वहीं जलने लगी। प्रहलाद पुन: जीवित बच गए जबकि होलिका जल गई। इन्हीं आठ दिनों को होलाष्टक के रूप में मनाया जाता है। ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि भगवान शिव की तपस्या को भंग करने के अपराध में कामदेव को शिव जी ने फाल्गुन की अष्टमी में भस्म कर दिया था। कामदेव की पत्नी रति ने उस समय क्षमा याचना की और शिव जी ने कामदेव को पुन: जीवित करने का आश्वासन दिया। इसी खुशी में लोग रंग खेलते हैं।
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