नारी संकल्प से बंधा ब्रह्मांड : स्त्रियां इस दिन व्रत आदि के माध्यम से अपने भीतर की दैवीय शक्ति को जाग्रत करती हैं। जब नारी अंतर्मन में शुभ संकल्प करती है तो ब्रह्मांड भी उसकी शक्ति के आगे नतमस्तक हो जाता है। एक स्त्री के संकल्प में अपार शक्ति निहित है। वह यमराज से भी पति के प्राणों की रक्षा करने में सक्षम है, बस इस कलिकाल में उस शक्ति को जागृत करने की आवश्यकता है।
अगणित जन्मों के पापों से मुक्ति : पौराणिक कथा के अनुसार एक बार माता पार्वती ने शिव जी से पूछा, “हे नाथ! कौन-सा व्रत ऐसा है, जो स्त्री के लिए शीघ्र फलदायी हो और जिससे अखंड सौभाग्य की प्राप्ति हो?” तब भगवान शिव ने कहा, “हे पार्वती! जिस व्रत को तुमने पहले जन्म में मेरे लिए किया था, वह हरितालिका तीज व्रत ही था। वही सबसे श्रेष्ठ है। इसे तुम पुनः करो और अन्य स्त्रियों को भी उपदेश दो, क्योंकि यह व्रत स्वयं आदिशक्ति द्वारा प्रतिपादित और मेरे द्वारा अनुमोदित है।” इसीलिए हरतालिका व्रत से स्त्री को अगणित जन्मों के पापों से मुक्ति मिलती है।
निर्जला व्रत : व्रत कथा के अनुसार, मां पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तप किया था। मां पार्वती ने जंगल में बिना अन्न और जल के कई दिनों तक ध्यान और उपवास किया। इस कठोर तपस्या की स्मृति में व्रती स्त्रियां भी हरतालिका तीज के दिन बिना जल ग्रहण किए व्रत करती हैं। यह व्रत शारीरिक संयम के साथ-साथ मानसिक और आत्मिक नियंत्रण करता है। जल न पीना व्रतधारिणी के संकल्प, भक्ति, निष्ठा और समर्पण को दर्शाता है। हरतालिका व्रत को बड़ी तीज की मान्यता प्राप्त है। जो स्त्रियां पूरे दिन निर्जला उपवास रखकर भगवान शिव और माता पार्वती का पूजन करती हैं, उन्हें अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु और सुखी वैवाहिक जीवन का वरदान प्राप्त होता है। यदि कोई कन्या यह व्रत करे तो उसे जीवन में उत्तम पति, शुभ संतान की प्राप्ति होती है। वहीं जिन स्त्रियों के वैवाहिक जीवन में कलह के कारण उथल-पुथल रहती है, उन्हें इस दिन मां पार्वती की पूजा कर वैवाहिक जीवन की मंगलकामना अवश्य करनी चाहिए। कहते हैं, इस व्रत के प्रभाव से जैसे मां पार्वती की इच्छा पूरी हुई थी, उसी प्रकार व्रतकर्ता स्त्री की मनोकामना भी पूरी होती है।
विधि-विधान : व्रती स्त्रियां सोलह शृंगार करती हैं, हाथों में सुंदर मेहंदी, पैरों में महावर और हरे-लाल नए वस्त्र धारण करती हैं। प्रमुख रूप से शिव-पार्वती तथा गणेश जी की पूजा की जाती है। इस व्रत में 24 घंटे का निर्जला उपवास रखा जाता है, जो अगली सुबह जल ग्रहण कर पारण के साथ पूर्ण होता है। पारण से पूर्व व्रती महिलाएं सौभाग्य, द्रव्य और वायन छूकर ब्राह्मणों को दान करती हैं, ताकि जीवन में सुख-समृद्धि और संतुलन बना रहे। हालांकि हरतालिका की विधि में लोक परंपराओं और कुल परंपराओं के अनुसार भिन्नताएं हो सकती हैं, लेकिन व्रत का मूल भाव एक ही है- शिव-पार्वती के प्रेम और आशीर्वाद के प्रतीक इस पर्व में स्त्री अपने भीतर की दिव्य शक्ति को जाग्रत करे।
वैधव्य योग का नाश : हरितालिका तीज सौभाग्यवर्धक होने के साथ स्त्रियों की जन्म-कुंडली में वर्णित वैधव्य योग का नाश करने वाली और संतान सुख प्रदान करने वाली होती है। स्त्रियों का सम्मान करने से शुक्र ग्रह बलवान होता है।
शुभ आचरण से पति की उन्नति : जिस परिवार की महिलाएं श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत-त्योहारों का पालन करती हैं, उनके शुभ आचरण तथा संकल्प से परिवार की उन्नति होती है। हरतालिका तीज का व्रत शुभ ग्रहों को जागृत कर घर में सुख-समृद्धि का कारण बनता है। नियमपूर्वक यह व्रत-उपवास करने से सौभाग्य एवं ग्रहों की अनुकूलता जागृत होती है। यह व्रत स्त्री की आध्यात्मिक शक्ति को सक्रिय कर घर में सुख-शांति और समृद्धि का आधार बनता है। जिस घर की स्त्रियां धर्म, कर्मपूर्वक मर्यादित ढंग से आचरण करती हैं, वहां खुशियों का अंबार लग जाता है।
चेतना का विस्तार : जहां अन्य व्रत पुण्य देते हैं, यह व्रत पुण्य के साथ चेतना का विस्तार करता है। व्रत के माध्यम से व्यर्थ विचार, क्रोध, ईर्ष्या और अशुद्धियों का त्याग स्वतः हो जाता है। हरतालिका तीज का व्रत कठोर होता है, जिसमें जल तक ग्रहण नहीं किया जाता। यह उपवास शरीर की परीक्षा के साथ स्त्रियों के मन और आत्मा की शक्ति को जागृत करने का सशक्त माध्यम है।
ग्रह स्थिति : यह पर्व गणेश चतुर्थी के एक दिन पहले भाद्रपद मास में आता है, जब प्रकृति में विशेष ऊर्जा होती है। भाद्रपद मास शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि दिन में 2 बजकर 11 मिनट तक रहेगी। हस्त नक्षत्र का शुभ सानिध्य व्रती महिलाओं को प्राप्त होगा। चंद्रमा की युति कन्या राशि में मंगल के साथ, सूर्य सिंह राशि का, कर्क राशि में बुध और शुक्र, मिथुन राशि का गुरु, शनि मीन राशि में विद्यमान है। छाया ग्रह राहु कुंभ राशि में और केतु सिंह राशि में है।
मेष और वृश्चिक राशि
इन राशियों के जातक लाल रंग के वस्त्र धारण करें और भगवान शिव तथा माता पार्वती की पूजा करें। माता का शृंगार लाल बिंदी और लाल फूलों से करें। ऐसा करने से इन राशियों के स्वामी ग्रह मंगल प्रसन्न होते हैं और अनुकूल फल प्रदान करते हैं।
वृषभ और तुला राशि
इन राशियों के लिए सफेद रंग शुभ रहता है। माता को चांदी के बिछुए, पायल आदि से श्रृंगारित करें और उन्हें सुगंधित सफेद फूल एवं इत्र अर्पित करें। इससे शुक्र ग्रह की कृपा बनी रहती है और घर-परिवार में सुख-शांति और समृद्धि आती है।
मिथुन और कन्या राशि
हरे वस्त्र पहनें और माता पार्वती को हरी चूड़ियां एवं हरी साड़ी अर्पण करें। इस प्रकार का पूजन बुध ग्रह को प्रसन्न करता है, जिससे बुद्धि और निर्णय क्षमता में वृद्धि होती है और घर का वातावरण सकारात्मक बना रहता है।
कर्क राशि
माता को बताशे, इलायची या दूध से बने मिष्ठान का भोग लगाएं और सफेद फूल चढ़ाएं। चंद्रमा जो इस राशि का स्वामी है, उसकी कृपा से मन को शांति और संतुलन मिलता है।
सिंह राशि
माता पार्वती का शृंगार गुलाबी फूलों से करें और गुड़ का भोग लगाएं। ऐसा करने से सूर्य देव का आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे आत्मबल और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।
धनु और मीन राशि
इन राशियों के जातकों को माता को पीले फूल, पीली चूड़ियां अर्पित करनी चाहिए। यह पूजन बृहस्पति देव को प्रसन्न करता है और जीवन में ज्ञान, शुभता और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है।
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