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Gangaur 2026: अखण्ड सौभाग्य का पर्व गणगौर आज, जानिए पूजन विधि, महत्व और इसकी खास परंपराएं

Sat, 21 Mar 2026 11:50 AM IST
Vinod Shukla धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

हिंदू धर्म में गणगौर व्रत का विशेष महत्व राजस्थान में होता है। गणगौर व्रत अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति की कामना के लिए रखा जाता है। इसमें विवाहित महिलाएं अपने पति की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और परिवार के कल्याण के लिए यह व्रत करती हैं।
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गणगौर व्रत 2026 - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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आज 21 मार्च, शनिवार को गणगौर व्रत है।  भारतीय सनातन परंपरा में स्त्री जीवन से जुड़े व्रत और उत्सव केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि भावनाओं, संबंधों और सांस्कृतिक मूल्यों का जीवंत स्वरूप होते हैं। इन्हीं में से एक है गणगौर का पावन पर्व, जो अखण्ड सौभाग्य, दांपत्य सुख और मंगलकामना का प्रतीक माना जाता है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाने वाला यह उत्सव विशेष रूप से महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है, जिसमें श्रद्धा, सौंदर्य और भक्ति का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।

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गणगौर का आध्यात्मिक अर्थ
‘गणगौर’ शब्द दो भागों से मिलकर बना है-‘गण’ अर्थात भगवान शिव (ईसर) और ‘गौर’अर्थात माता पार्वती। यह पर्व शिव और पार्वती के दिव्य मिलन और उनके आदर्श दांपत्य जीवन का प्रतीक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने कठोर तपस्या कर भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया था, जिससे यह व्रत स्त्रियों के लिए आदर्श बन गया।

अखण्ड सौभाग्य की कामना का महत्व
गणगौर व्रत का मुख्य उद्देश्य अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति माना जाता है। विवाहित महिलाएं अपने पति की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और परिवार के कल्याण के लिए यह व्रत करती हैं, जबकि अविवाहित कन्याएं मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए पूरे मनोयोग से गणगौर की पूजा करती हैं। यह परंपरा स्त्री जीवन में आशा, विश्वास और समर्पण के भाव को और अधिक दृढ़ करती है।
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पूजन की पारंपरिक विधि
इस दिन प्रातःकाल महिलाएं और कन्याएं सुंदर वस्त्र धारण कर, सिर पर लोटा लेकर बाग-बगीचों की ओर जाती हैं। वहां से शुद्ध जल लाकर उसमें हरी दूब और पुष्प सजाए जाते हैं। घर लौटकर शुद्ध मिट्टी से ईसर (शिव) और गौर (पार्वती) की प्रतिमाएं बनाकर उन्हें विधिपूर्वक स्थापित किया जाता है। इसके पश्चात चंदन, अक्षत, धूप, दीप, पुष्प और सुहाग सामग्री अर्पित कर पूजा की जाती है।

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सुहाग परंपराएं और प्रतीकात्मक अनुष्ठान
गणगौर पूजन में सुहाग से जुड़े विशेष अनुष्ठानों का अत्यंत महत्व होता है। दीवार पर रोली, मेहंदी और काजल से सोलह-सोलह बिंदियां लगाई जाती हैं, जो सोलह श्रृंगार का प्रतीक मानी जाती हैं। थाली में जल, दूध, दही, हल्दी और कुमकुम मिलाकर ‘सुहाग जल’ तैयार किया जाता है, जिससे पहले गणगौर को अर्पित कर फिर महिलाएं स्वयं पर छिड़कती हैं। माता पार्वती को अर्पित सिन्दूर को अपनी मांग में धारण करना भी इस दिन विशेष शुभ माना जाता है।

विसर्जन और लोकगीतों की परंपरा
पूजन के उपरांत महिलाएं गणगौर के मंगल गीत गाती हैं, जो इस उत्सव को और भी भावपूर्ण बना देते हैं। संध्या समय शुभ मुहूर्त में गणगौर को जल अर्पित कर किसी पवित्र सरोवर या कुंड में उनका विसर्जन किया जाता है। यह प्रक्रिया श्रद्धा और समर्पण के साथ पूर्ण होती है, जिसमें लोक परंपराओं की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

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