Ganesh Chaturthi 2025: हिंदू धर्म में गणेशोत्सव के त्योहार का विशेष महत्व होता है। 10 दिनों तक चलने वाला गणेशोत्सव जल्द ही आरंभ होने वाला है और घर-घर बप्पा विराजेंगे। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर भगवान गणेश का जन्म हुआ था। हिंदू पंचांग के अनुसार इस वर्ष गणेश चतुर्थी का पर्व 27 अगस्त को मनाया जाएगा। गणेश उत्सव पर लोग अपने-अपने घरों में गणपति बप्का की मूर्तियां स्थापित करते हैं और अनंत चतुर्दशी तिथि पर इनका विसर्जन करते हैं। हिंदू धर्म में भगवान गणेश को प्रथम पूज्य देवता माना जाता है। किसी भी शुभ और मांगलिक कार्यों में सबसे पहले भगवान गणेश की पूजा होती है फिर उसके बाद दूसरे देवी-देवताओं का आवहन और पूजा शुरू की जाती है। भगवान गणेश को विध्न विनाशक और मंगलकारी देवता माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान गणेश की पूजा करने से कार्यो में आने वाले विध्न दूर होते हैं और रिद्धि-सिद्धि और शुभ-लाभ का वास होता है। आइए जानते हैं भगवान गणेश की पूजा का महत्व और वास्तु दोष को दूर करने में भगवान गणेश किस तरह सहायक होते हैं।
वास्तुदोष दूर करने के लिए इस तरह लगाएं गणेश जी की मूर्ति
यदि घर के मुख्य द्वार पर एकदंत की प्रतिमा या चित्र लगाया गया हो तो उसके दूसरी तरफ ठीक उसी जगह पर दोनों गणेशजी की पीठ मिली रहे इस प्रकार से दूसरी प्रतिमा या चित्र लगाने से वास्तु दोष दूर होता है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।
सुख-समृद्धि लाते हैं गणेश जी की ऐसी मूर्ति
सभी तरह की मंगलकामना के लिए सिंदूरी रंग के गणपति की आराधना बहुत ही शुभ और अनुकूल रहती है। सुख, शांति, समृद्धि की चाह रखने वालों को सफेद रंग के विनायक की मूर्ति लाना चाहिए। घर में पूजा के लिए गणेश जी की शयन या बैठी मुद्रा हो तो अधिक शुभ होती है। यदि कला या अन्य शिक्षा के प्रयोजन से पूजन करना हो तो नृत्य गणेश की प्रतिमा या तस्वीर का पूजन लाभकारी है।
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बायीं सूंड वाले गणेश जी की प्रतिमा का महत्व
घर में बैठे हुए और बायीं ओर मुड़ी सूंड वाले गणेश जी विराजित करना अच्छा माना जाता है। दाएं हाथ की ओर घुमी हुई सूंड वाले गणेशजी हठी होते हैं और उनकी साधना-आराधना कठिन होती है। वे देर से भक्तों पर प्रसन्न होते हैं । इन्हें मंदिर में स्थापित किया जाता है।
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कार्यस्थल पर गणेश जी की मूर्ति
कार्यस्थल पर गणेश जी की मूर्ति विराजित कर रहे हों तो खड़े हुए गणेश जी की मूर्ति लगाएं। इससे कार्यस्थल पर स्फूर्ति और काम करने की उमंग हमेशा बनी रहती है। ध्यान रहे कि खड़े हुए श्रीगणेश जी के दोनों पैर जमीन को स्पर्श करते हुए हों, इससे कार्य में स्थिरता आती है। कार्य क्षेत्र पर किसी भी भाग में वक्रतुण्ड की प्रतिमा या चित्र लगाए जा सकते हैं, लेकिन यह ध्यान जरूर रखना चाहिए कि किसी भी स्थिति में इनका मुंह दक्षिण दिशा या नैऋय कोण में नहीं होना चाहिए।
अशुभ ग्रहों की शांति के लिए गणेश जी मूर्ति
स्वस्तिक को गणेश जी का रूप माना जाता है। वास्तु शास्त्र भी दोष निवारण के लिए स्वास्तिक को उपयोगी मानता है। स्वास्तिक वास्तु दोष दूर करने का महामंत्र है एवं यह ग्रह शान्ति में लाभदायक है। भवन के जिस भाग में वास्तु दोष हो उस स्थान पर घी मिश्रित सिंदूर से दीवार पर स्वास्तिक बनाने से वास्तु दोष का प्रभाव कम होता है।