भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में रणथम्भौर में इकलौता ऐसा गणेश मंदिर है जहाँ श्री गणेश की तीन नेत्रों वाली प्रतिमा विराजमान है एवं जहाँ गणपति बप्पा अपने पूरे परिवार,दो पत्नी-रिद्धि और सिद्धि एवं दो पुत्र-शुभ और लाभ के साथ विराज रहे हैं। इस मंदिर में भगवान गणेश त्रिनेत्र रूप में विराजमान हैं, जिसमें तीसरा नेत्र ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। गजवंदनम चितयम नामक ग्रन्थ में विनायक के तीसरे नेत्र का वर्णंन किया गया है।
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मान्यता है कि भगवान शिव ने अपना तीसरा नेत्र उत्तराधिकारी के रूप में गणपति को सौंप दिया था और इस तरह महादेव की समस्त शक्तियां गजानन में निहित हो गईं और वे त्रिनेत्र बने। देश में चार स्वयंभू गणेश मंदिर हैं जिनमें रणथम्भौर स्थित त्रिनेत्र गणेश जी प्रथम हैं। रणथम्भौर त्रिनेत्र गणेशजी का मंदिर प्रसिद्द रणथम्भौर टाइगर रिज़र्व एरिया में स्थित है,इसे रणतभँवर मंदिर भी कहा जाता है।यह मंदिर1579 फ़ीट ऊंचाई पर अरावली और विंध्यांचल की पहाड़ियों में स्थित है।मंदिर तक पहुँचने के लिए बहुत सीढियाँ चढ़नी पढ़ती हैं।
आते हैं पत्र और निमंत्रण
यहाँ की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ आने वाले पत्र हैं। ई-मेल, व्हाट्सएप और मैसेज के इस दौर में आज भी यहां के डाकिया को करीब हजारों पत्र और स्पीड पोस्ट एक ही पते पर लाने पड़ते हैं, ये पता है रणथंभौर किले में स्थित त्रिनेत्र गणेशजी टैंपल का।घर में कोई भी शुभ कार्य हो या फिर शादी,सबसे पहले प्रथम पूज्य गणेश जी महाराज को भक्तों द्वारा निमंत्रण पत्र भेजा जाता है।इतना ही नहीं परेशानी होने पर उसे दूर करने की अरदास भक्त यहाँ पत्र भेजकर लगाते हैं।
नित्य प्रति हज़ारों की संख्या में निमंत्रण पत्र और चिट्ठियां यहाँ डाक से पहुँचती हैं,जिन्हें पुजारी बड़ी श्रृद्धा से गणेशजी की प्रतिमा के सामने पढ़कर सुनाते है। मान्यता है कि यहाँ सच्चे मन से मांगी गई मनोकामना अवश्य पूरी होती है। भाद्रपद शुक्ल की चतुर्थी को यहाँ मेला आयोजित होता है जिसमें लाखों की संख्या में श्रद्धालु अपनी हाज़िरी लगाते हैं। इस दौरान पूरा वातावरण गजानन जी महाराज के जयकारों से गूँज उठता है। भगवान त्रिनेत्र की परिक्रमा सात किलोमीटर की है जिसे भक्त नाचते-गाते हुए जयकारों के साथ पूरी करते है।यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता तो बस देखते ही बनती है ,बारिश के मौसम में यहाँ पहाड़ियों में कई जगह बरसाती झरने बहने लगते हैं,जिससे यहाँ का माहौल और भी रमणीय हो जाता है।जिन दिनों गणेश जी का मेला आयोजित होता है तब हज़ारों की संख्या में भक्ति और आस्था में डूबे श्रद्धालु दर्शन कर पुण्य अर्जित करते हैं।
इसलिए मानते है प्रथम गणेश
रामायण काल और द्वापर युग में भी त्रिनेत्र गणेश जी का प्रसंग मिलता है। मान्यता हैं कि भगवान राम ने अपनी सेना सहित लंका प्रस्थान से पहले गणेशजी के इसी रूप का अभिषेक किया था। एक और मान्यता के अनुसार द्वापर युग में लीलाधारी श्री कृष्ण का विवाह रुक्मणी से हुआ था,विवाह में वे गणेशजी को बुलाना भूल गए। गणेशजी के वाहन मूषकों ने कृष्ण के रथ के आगे-पीछे सब जगह खोद दिया। श्री कृष्ण को अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्होंने गणेशजी को मनाया। जहां पर कृष्ण जी ने गणेशजी को मनाया वह स्थान रणथंभौर था। यही कारण है कि रणथम्भौर गणेश को भारत का प्रथम गणेश कहते है। मान्यता है कि विक्रमादित्य भी हर बुधवार को यहां पूजा करने आते थे।
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