धूमधाम से मनाया जाता है यह महापर्व
उत्सव,आस्था और श्रद्धा की पावन नगरी जयपुर (गुलाबी नगरी) में गणगौर का त्यौहार बड़े पारंपरिक ढंग और धूम-धाम से मनाया जाता है। गणगौर की सवारी(मेला) हर वर्ष जयपुर में महाराजा सवाई मानसिंह द्धितीय संग्रहालय ट्रस्ट और पर्यटन विभाग के सहयोग से शाही ठाट-बाट और धूम-धाम से निकाली जाती है, जिसमें जयपुर राजपरिवार की प्रमुख भूमिका होती है।राजपरिवार की महिलाएं स्वर्ण आभूषणों से सुसज्जित गणगौर को चांदी की पालकी में बैठाकर पूजा-अर्चना के बाद पालकी को विदा करती हैं। यह पालकी पूरे लवाजमे और गीत-संगीत के साथ निकलती है।
शान से निकलती है गणगौर की सवारी
गणगौर की भव्य सवारी में पारंपरिक नृत्य जैसे कच्ची घोड़ी, कालबेलिया, बहरूपिया, अलगोज़ा, गैर, चकरी आदि शामिल होते हैं। परंपरागत वेशभूषा में राजपरिवार के सदस्य, सजे-धजे हाथी, घोड़े, ऊँट पर बैठ कर चलते हैं।पीछे-पीछे पुरुषों का एक बड़ा समूह हाथ में पचरंगा लिए चलता है। इनके पीछे राजस्थानी पोशाक में कलश लिए महिलाओं का बहुत बड़ा दल होता है। गणगौर की शाही सवारी सिटी पैलेस से रवाना होकर त्रिपोलिया बाज़ार, छोटी चौपड़ और गणगौरी बाज़ार होते हुए तालकटोरा की पाल पर पहुँचती है। यहाँ गणगौर को जल पिलाया जाता है। दूसरे दिन बूढ़ी गणगौर की सवारी निकालने की परंपरा है। गुलाबी नगरी की इस भव्य सवारी को देखने के लिए पूरे विश्व से पर्यटक खिंचे चले आते हैं।