नवरात्रि से ठीक एक दिन पहले की अमावस्या को सर्वपितृ अमावस्या और महालया अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महालया से दुर्गा पूजा प्रारंभ होती है। बंगाल में महालया का विशेष महत्व है। एक तरफ जहां इस दिन से श्राद्ध खत्म हो जाते है वही धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन मां दुर्गा का आगमन कैलाश पर्वत से धरती पर होता है और अगले 10 दिनों तक मां धरती पर ही रहती है। महालया के दिन मूर्तिकार मां दुर्गा की प्रतिमा में आंखों को तैयार करते हैं और महालया के बाद ही मां दुर्गा की मूर्तियों को अंतिम रूप देकर पंडालों में सजा दिया जाता हैं। पितृपक्ष की अंतिम श्राद्ध तिथि यानी अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि अमावस्या को महालया पर्व मनाया जाता है। इस बार यह पर्व आज 28 सितंबर को है।
महालया का महत्व
धार्मिक कथाओं के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने अत्याचारी राक्षस महिषासुर का संहार करने के लिए मां दुर्गा का सृजन किया था। महिषासुर को यह वरदान प्राप्त था कि कोई भी देवता या मनुष्य उसका वध नहीं कर पाएगा। इस वरदान के सहारे महिषासुर राक्षसों का राजा बन गया और उसने देवताओं पर आक्रमण कर दिया। वरदान की वजह से देवता उससे युद्ध में हार गए और देवलोक यानी स्वर्ग पर महिषासुर का राज हो गया। अपनी रक्षा करने के लिए सभी देवताओं ने भगवान विष्णु के साथ आदि शक्ति की आराधना प्रारंभ की। देवताओ के तप करने से सभी देवताओं के शरीर में से एक दिव्य रोशनी प्रकट हुई, जिसने देवी दुर्गा का रूप धारण कर लिया। अस्त्र शस्त्रों से सुसज्जित मां दुर्गा ने महिषासुर से नौ दिनों तक भीषण युद्ध किया और 10 वें दिन उसका वध कर दिया। दरअसल महालया मां दुर्गा के धरती पर आगमन का प्रतीक है। मां दुर्गा को शक्ति की देवी माना जाता है और नवरात्रि के नौ दिनों तक धरती पर रहकर अपने भक्तों पर कृपा बरसाती हैं।