अमेरिका का सबसे बड़ा और भव्य दिवाली मेला आज आयोजित हो रहा है, क्योंकि दिवाली के समय मेला स्थल पर स्टेट फेयर चल रहा था। एक परिवार की दिवाली पार्टी के तौर पर शुरू हुए इस मेले ने डलास और उसके आसपास रहने वाले भारतीय परिवारों पर गहरा असर डाला है। टेक्सास का स्टेट फेयर खत्म हुए दो सप्ताह बीत चुके हैं, लेकिन डलास के इस मैदान में तले हुए ओरेओ और फनेल केक की सुगंध अब भी बाकी है। इसी जगह 60,000 भारतीय अमेरिकी आज यानी शनिवार (भारतीय समयानुसार रविवार) को दिवाली मनाने के लिए इकट्ठा होंगे। स्टेट फेयर की तरह यह सालाना उत्सव भी, जिसे आधिकारिक तौर पर डीएफडब्ल्यू (डलास फोर्ट वर्थ) दिवाली मेला कहा जाता है, खाने-पीने और आनंद मनाने पर केंद्रित है। कॉटन बाउल के आसपास होने वाला यह सालाना आयोजन अमेरिका में दिवाली का सबसे बड़ा और सबसे भव्य आयोजन है।
हालांकि इतने लोगों के जमावड़े के लिए डलास बहुत उपयुक्त जगह नहीं है। यहां आयोजन होने की एक बड़ी वजह यह है कि आसपास के इलाके में भारतीयों की बड़ी आबादी (2010 की जनगणना के मुताबिक, 1,08,000) रहती है। हालांकि शिकागो क्षेत्र में भारतीयों की इससे करीब दोगुनी आबादी रहती है और न्यूयॉर्क-न्यू जर्सी इलाके में भारतीयों की आबादी इससे पांच गुनी अधिक है। दिवाली का त्योहार विगत 19 अक्तूबर को ही मनाया जा चुका है, पर तब यहां स्टेट फेयर चल रहा था, इसलिए दिवाली मेले का आयोजन अब हो रहा है। सप्ताहांत होने के कारण लोगों की छुट्टियां रहेंगी। इस मेले में भाग लेने का बड़ा आकर्षण इसका भव्य स्वरूप है इस अवसर पर बॉलीवुड के गायक आते हैं। डेढ़ सौ वॉलंटियर मिलकर रामलीला का आयोजन करते हैं। रात में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं और सैकड़ों रसोइए मिलकर मसालेदार व्यंजन और मिठाइयां तैयार करते हैं।
इस साल का आयोजन हालांकि पिछली बार की तुलना में थोड़ा अलग है, क्योंकि यह हार्वी तूफान के तुरंत बाद हो रहा है, जिसमें ह्यूस्टन सहित टेक्सास के दक्षिण पूर्व में बहुत नुकसान हुआ है। पर आयोजकों को उम्मीद है कि ह्यूस्टन में रहने वाले भारतीयों की बड़ी आबादी दो सौ किलोमीटर की दूरी तय कर इस मेले में पहुंचेगी, क्योंकि बाढ़ के कारण विगत सात अक्तूबर को ह्यूस्टन में आयोजित दिवाली मेले में भीड़ कम थी। डलास मेले के संस्थापक सतीश गुप्ता कहते हैं, ‘ह्यूस्टन में मेरे बहुत सारे दोस्त हैं और यह पूछने की बात नहीं है कि हम उनके लिए क्या मदद कर रहे हैं।’ गौरतलब है कि डीएफडब्ल्यू दिवाली मेले का सहयोगी संगठन डीएफडब्ल्यू इंडियन कल्चरल सोसाइटी ह्यूस्टन समेत दूसरी जगहों में तूफान से प्रभावित भारतीय परिवारों की मदद कर रहा है।
डलास दिवाली मेले का मुख्य आकर्षण भारतीय व्यंजनों की विविधता है। दिवाली के अवसर पर बनने वाले तमाम भारतीय व्यंजनों को पेश करने पर यहां विशेष ध्यान रखा जाता है। डलास दिवाली मेले की यह विशेषता ही उसे अमेरिका में आयोजित होने वाले दूसरे दिवाली मेलों से अलग करती है। इस मेले की एक आयोजक कल्पना फ्रूटवाला कहती हैं, ’इस मेले में आप गुजराती स्नैक्स का आनंद उठाते हुए तमिल नाटक सुन सकते हैं और दक्षिण भारतीय नृत्य देख सकते हैं।’ इस मेले में सुभाष चंदर, जिनकी इरविंग में बॉम्बे स्वीट्स ऐंड स्नैक्स नाम से दुकान है, बंगाली मिठाइयों के अलावा-जिनमें चमचम और गुलाब जामुन होते हैं- दूध और बादाम से मिठाइयां बनाते हैं। हाल ही में इरविंग में एक दोपहर को चंदर दूध और कसा नारियल पका रहे थे, ताकि नरम चमचम तैयार किए जा सकें। ‘मिठाई बनाते हुए बहुत धैर्य रखना पड़ता है।
अट्ठारह वर्ष इस पेशे में रहने के बाद मुझे नरम चमचम बनाने का राज समझ में आया है,’ चंदर कहते हैं। इरविंग के ही ललित थोटा इंडिया 101 नाम का अपना रेस्टोरेंट खोलने में व्यस्त थे। वह मेले में जांगीरी नाम की मिठाई बनाएंगे, जो आंध्र प्रदेश में बेहद लोकप्रिय है। इसी के नजदीक बावर्ची बिरियानीज के अनिल सुखगोपाल मेले में मैसूर पाक बेचेंगे, जिसे बेसन और देसी घी से तैयार किया जाता है और जो कर्नाटक की बेहद प्रसिद्ध मिठाई है। सुखगोपाल कहते हैं, ‘हम मेले में ऐसा माहौल बनाना चाहते हैं, ताकि लोगों को लगे कि वे मुंबई में हैं। हम मेले में अपने व्यंजन और मिठाइयां आवाज लगा-लगाकर बेचेंगे। लोगों की भीड़ इकट्ठा हो जाएगी। इस तरह का अनुभव बहुत सुखद होता है।’ प्लेनो से आए नगा कोली, जिनकी वहां सरवन भवन नाम से दक्षिण भारतीय रेस्टोरेंट है, डोसा और इडली के साथ पायसम तैयार करेंगे। पायसम तमिलनाडु में बहुत लोकप्रिय है, और दिवाली के समय सबसे पहले यही खाया जाता है।
डलास में दिवाली मेले की शुरुआत 1994 में गुप्ता परिवार की एक हाउस पार्टी के तौर पर हुई थी, जिसमें करीब पचास मेहमान आए थे। बाद में उन्होंने ही इसे मेले के तौर पर शुरू करने का आइडिया दिया। वह कहते हैं, ‘हम इसे मेले का रूप देना इसलिए चाहते थे कि हमारी नई पीढ़ी को भारत में मनाई जाने वाली दिवाली से परिचित करा सकें।’ इस मेले का डलास और उसके आसपास के भारतीय परिवारों पर असर पड़ा है। न सिर्फ यहां भारतीयों की आबादी बढ़ी है, बल्कि यहां के स्कूलों में दिवाली पर छुट्टी की मांग भी होने लगी है। समारोह के अंत में बॉलीवुड म्यूजिक और रंगीन लेजर शो के बीच दीयों की शक्ल के पटाखे चलाए जाते हैं। 'धूम-धड़ाके के बिना दिवाली पूरी नहीं होती,’ गुप्ता मुस्कराते हुए कहते हैं।