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Devshayani Ekadashi 2023: हरिशयनी एकादशी आज, जानिए पूजा विधि और चार महीने क्यों नहीं किए जाते मांगलिक कार्य

Thu, 29 Jun 2023 08:54 AM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी से कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी तक लगभग चार माह के इस अंतराल को चार्तुमास कहा गया है। धार्मिक दृष्टि से ये चार महीने भगवान विष्णु के निद्राकाल माने जाते हैं।
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Ekadashi Vrat 2023 - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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Devshayani Ekadashi 2023: आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पद्मनाभा,आषाढ़ी, हरिशयनी और देवशयनी एकादशी भी कहा जाता है। शास्त्रानुसार श्रीनारायण ने एकादशी का महत्व बताते हुए कहा है कि देवताओं में श्रीकृष्ण, देवियों में प्रकृति, वर्णों में ब्राह्मण तथा वैष्णवों में भगवान शिव श्रेष्ठ हैं उसी प्रकार व्रतों में एकादशी व्रत श्रेष्ठ है। देवशयनी एकादशी की रात में जागरण करके शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान विष्णु की भक्तिपूर्वक पूजा करने वाले के पुण्य की गणना करने में चतुर्मुख ब्रह्माजी भी असमर्थ हैं। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी से कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी तक लगभग चार माह के इस अंतराल को चार्तुमास कहा गया है। धार्मिक दृष्टि से ये चार महीने भगवान विष्णु के निद्राकाल माने जाते हैं।

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 चिकित्सा विज्ञान के अनुसार इस दौरान सूर्य व चंद्र का तेज पृथ्वी पर कम पहुंचता है ,जल की मात्रा अधिक हो जाती है, वातावरण में अनेक जीव-जंतु उत्पन्न हो जाते हैं जो अनेक रोगों का कारण बनते हैं। इसलिए साधु-संत ,तपस्वी इस काल में एक ही स्थान पर रहकर तप ,साधना ,स्वाध्याय व प्रवचन आदि करते हैं। इन दिनों केवल ब्रज की यात्रा की जा सकती है क्योंकि इन महीनों में भूमण्डल के समस्त तीर्थ ब्रज में आकर वास करते हैं।

वर्जित हैं मांगलिक कार्य
गरुड़ध्वज जगन्नाथ के शयन करने पर विवाह, यज्ञोपवीत संस्कार, दीक्षाग्रहण, यज्ञ, गोदान, गृहप्रवेश आदि सभी शुभ कार्य चार्तुमास में त्याज्य हैं। इसका कारण यह है कि जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर बलि से तीन पग भूमि मांगी,तब दो पग में पृथ्वी और स्वर्ग को श्री हरि ने नाप दिया और जब तीसरा पग रखने लगे तब बलि ने अपना सिर आगे रख दिया। भगवान विष्णु ने राजा बलि से प्रसन्न होकर उनको पाताल लोक दे दिया और उनकी दानभक्ति को देखते हुए वर मांगने को कहा । बलि ने कहा -'प्रभु आप सभी देवी-देवताओं के साथ मेरे लोक पाताल में निवास करें।' और इस तरह श्रीहरि समस्त देवी-देवताओं के साथ पाताल चले गए ,यह दिन एकादशी (देवशयनी) का था । इस दिन से सभी मांगलिक कार्यों के दाता भगवान विष्णु का पृथ्वी से लोप होना माना गया है।
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भक्तिभाव से कराएं शयन
सभी एकादशियों को श्री नारायण की पूजा की जाती है । परन्तु इस एकादशी को श्री हरि का शयनकाल  प्रारम्भ होने के कारण उनकी विशेष विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए। पदम पुराण के अनुसार देवशयनी एकादशी के दिन कमललोचन भगवान विष्णु का कमल के फूलों से पूजन करने से तीनों लोकों के देवताओं का पूजन हो जाता है। इस दिन उपवास करके भगवान विष्णु की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान करवाकर पीत वस्त्रों व पीले दुपट्टे से सजाकर श्री हरि कीआरती उतारनी चाहिए । भगवान को पान-सुपारी अर्पित करने के बाद इस मन्त्र के द्वारा स्तुति करें।

      'सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत सुप्तं भवेदिदम।
         विबुद्धे त्वयि बुध्येत जगत सर्वं चराचरम।'

'हे जगन्नाथ जी! आपके सो जाने पर यह सारा जगत सुप्त हो जाता है और आपके जाग जाने पर सम्पूर्ण विश्व तथा चराचर भी जागृत हो जाते हैं  । प्रार्थना करने के बाद भगवान को श्वेत वस्त्रों की शय्या पर शयन करा देना चाहिए ।
चौमासे में भगवान विष्णु सोये  रहते हैं इसलिए शास्त्रानुसार मनुष्य को भूमि पर शयन करना चाहिए  । सावन में साग,भादों में दही , क्वार में दूध और कार्तिक में दाल का त्याग कर देना चाहिए।

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