मां कात्यायनी की उपासना का महत्व
नवरात्रि पूजा के छठे दिन देवी के कात्यायनी स्वरूप की उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन 'आज्ञा चक्र' में स्थित होता है। योग साधना में इस चक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। इस चक्र में स्थित मन वाला साधक मां कात्यायनी के चरणों में अपना सर्वस्व निवेदित कर देता है। परिपूर्ण आत्मदान करने वाले ऐसे भक्त को सहज भाव से मां कात्यायनी के दर्शन प्राप्त हो जाते हैं।
देवी का स्वरूप और दिव्यता
मां कात्यायनी अमोघ फलदायिनी हैं। इनका स्वरूप अत्यंत भव्य और दिव्य है। इनका वर्ण स्वर्ण के समान चमकीला और भास्वर है। शेर पर सवार मां की चार भुजाएं हैं। इनके बाएं हाथ में कमल और तलवार तथा दाहिने हाथों में स्वास्तिक और आशीर्वाद की मुद्रा अंकित है।
Hindu Puranas: कौन-कौन से सनातन धर्म के 18 पुराण ? जानिए नाम और इनके महत्व
व्रज की गोपियों की आराध्या
भगवान कृष्ण को पाने के लिए व्रज की गोपियों ने कालिंदी नदी के तट पर मां कात्यायनी की पूजा की थी। इसी कारण ये ब्रज मंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं और भक्ति तथा प्रेम की प्रतीक मानी जाती हैं।
महर्षि कात्यायन से संबंध
कत नामक एक प्रसिद्ध महर्षि थे, उनके पुत्र ऋषि कात्य हुए। इन्हीं कात्य के गोत्र में विश्व प्रसिद्ध महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए। उन्होंने भगवती पराम्बा की उपासना करते हुए वर्षों तक कठोर तपस्या की। उनकी इच्छा थी कि मां भगवती उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लें। मां ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली।
Durga Ashtami 2026: 25 या 26 मार्च कब है दुर्गा अष्टमी और कब किया जाएगा कन्या पूजन? जानें तिथि और शुभ मुहूर्त
महिषासुर वध हेतु अवतरण
जब दानव महिषासुर का अत्याचार पृथ्वी पर अत्यधिक बढ़ गया, तब ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने अपने तेज का अंश देकर एक दिव्य देवी को प्रकट किया। महर्षि कात्यायन ने सर्वप्रथम इनकी पूजा की और इसी कारण देवी का नाम कात्यायनी पड़ा।
पूजा फल और लाभ
देवी भागवत पुराण के अनुसार इस स्वरूप की पूजा करने से शरीर कांतिमान हो जाता है और गृहस्थ जीवन सुखमय रहता है। माँ कात्यायनी की भक्ति से मनुष्य को अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है। रोग, शोक, संताप और भय का नाश होता है। जिनके विवाह में विलंब हो रहा हो या वैवाहिक जीवन में बाधाएँ हों, उन्हें विशेष रूप से माँ कात्यायनी की उपासना करनी चाहिए।
मां को प्रसन्न करने की विधि
छठे दिन सर्वप्रथम कलश और देवी कात्यायनी के स्वरूप की पूजा की जाती है। पूजा प्रारंभ करते समय हाथों में सुगंधित पुष्प लेकर देवी को प्रणाम करें और उनके मंत्र का ध्यान करें। माँ को श्रृंगार की सभी वस्तुएँ अर्पित करें। उन्हें शहद अत्यंत प्रिय है, इसलिए भोग में शहद अर्पित करना शुभ माना गया है। इस दिन देवी की पूजा के साथ भगवान शिव की आराधना भी करनी चाहिए।
पूजा मंत्र
या देवी सर्वभूतेषु मां कात्यायनी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
चंद्र हासोज्जवलकरा शार्दूलवर वाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद् देवी दानवघातिनि।।