भीष्म अष्टमी व्रत कथा
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भीष्म अष्टमी व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, भीष्म देवी गंगा और राजा शांतनु के आठवें पुत्र थे जिनका मूल नाम देवव्रत था जो उनके जन्म के समय दिया गया था। अपने पिता को खुश करने के लिए देवव्रत ने जीवन भर ब्रह्मचर्य का पालन किया। देवव्रत को मुख्य रूप से मां गंगा द्वारा पोषित किया गया था और बाद में महर्षि परशुराम को शास्त्र विद्या प्राप्त करने के लिए भेजा गया था। उन्होंने शुक्राचार्य के मार्गदर्शन में महान युद्ध कौशल और सीख हासिल की जो उन्हें अजेय बनाती थी।
शिक्षा पूरी करने के बाद, देवी गंगा देवव्रत को अपने पिता, राजा शांतनु के पास लायीं और फिर उन्हें हस्तिनापुर का राजकुमार घोषित किया गया। इस दौरान, राजा शांतनु को सत्यवती नाम की एक महिला से प्रेम हो गया और वह उससे विवाह करना चाहते थे। लेकिन सत्यवती के पिता ने एक शर्त पर गठबंधन के लिए सहमति व्यक्त की। शर्त यह थी कि राजा शांतनु और सत्यवती की संतानें ही भविष्य में हस्तिनापुर राज्य पर शासन करेंगी।
स्थिति को देखते हुए, देवव्रत ने अपने पिता के लिए अपना राज्य छोड़ दिया और जीवन भर कुंवारे रहने का संकल्प लिया। ऐसे संकल्प और बलिदान के कारण, देवव्रत भीष्म नाम से पूजनीय हुए। उनकी प्रतिज्ञा को भीष्म प्रतिज्ञा कहा गया। यह सब देखकर, राजा शांतनु भीष्म से बहुत प्रसन्न हुए और इस प्रकार उन्होंने भीष्म को इच्छा मृत्यु का वरदान दिया। अपने जीवनकाल के दौरान, भीष्म को भीष्म पितामह के रूप में बहुत सम्मान मिला।
महाभारत के युद्ध में, वे कौरवों के साथ खड़े थे और उन्होंने उनका पूरा समर्थन किया। भीष्म पितामह ने शिखंडी के साथ युद्ध नहीं करने और उसके खिलाफ किसी भी प्रकार का हथियार न चलाने का संकल्प लिया था। अर्जुन ने शिखंडी के पीछे खड़े होकर भीष्म पर हमला किया और इसलिए भीष्म घायल होकर बाणों की शय्या पर गिर पड़े।
हिंदू मान्यताओं के अनुसार, यह माना जाता है कि जो व्यक्ति उत्तरायण के शुभ दिन पर अपना शरीर त्यागता है, वह मोक्ष प्राप्त करता है, इसलिए उन्होंने कई दिनों तक बाणों की शैय्या पर प्रतीक्षा की और अंत में अपने शरीर को छोड़ दिया। उत्तरायण अब भीष्म अष्टमी के रूप में मनाया जाता है।