भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को बहुला चतुर्थी या बहुला चौथ के नाम से जाना जाता है। हिंदू पंचांग के मुताबिक, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि की शुरुआत 31 अगस्त सोमवार के दिन सुबह 8 बजकर 51 मिनट पर होगी। इसके अगले दिन यानी 1 सितंबर मंगलवार के दिन सुबह 7 बजकर 41 मिनट पर चतुर्थी तिथि समाप्त हो जाएगी। इस व्रत में चंद्र दर्शन का विशेष महत्व बताया जाता है। बहुला चतुर्थी का व्रत 31 अगस्त 2026 को रखा जाएगा।
व्रत का महत्व
यह दिन भगवान गणेश, श्रीकृष्ण और गौमाता की पूजा के लिए विशेष माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखकर भगवान श्रीकृष्ण और गणेशजी के साथ गाय-बछड़े की पूजा करने से संतान सुख की कामना पूरी होती है। मान्यता है कि बहुला चौथ का व्रत संतान की सुख-समृद्धि और परिवार में खुशहाली के लिए भी फलदायी होता है।
ऐसे करें बहुला चौथ की पूजा
बहुला चौथ के दिन प्रातः जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। महिलाएं इस दिन निराहार व्रत रखती हैं और शाम के समय गाय और बछड़े की पूजा करती हैं। पूजा के लिए घर में विभिन्न प्रकार के पकवान बनाए जाते हैं, जिन्हें भगवान गणेश और श्रीकृष्ण को भोग के रूप में अर्पित किया जाता है। इसके बाद यह भोग गाय और बछड़े को खिलाया जाता है। पूजा के बाद दाएं हाथ में चावल के दाने लेकर बहुला चौथ की कथा सुननी चाहिए। कथा श्रवण के बाद गाय और बछड़े की प्रदक्षिणा करें और परिवार में सुख-शांति तथा संतान की मंगलकामना के लिए प्रार्थना करें।
बहुला की परीक्षा लेने आए श्रीकृष्ण
पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं को देखने के लिए कामधेनु गाय ने बहुला के रूप में नंद की गोशाला में प्रवेश किया था। श्रीकृष्ण को बहुला गाय बहुत प्रिय थी और वे उसके साथ काफी समय बिताते थे। बहुला का एक बछड़ा भी था। जब वह चरने के लिए जाती थी तो बछड़ा उसे बहुत याद करता था। एक दिन बहुला चरते-चरते जंगल में काफी दूर निकल गई। वहां अचानक उसकी नजर एक शेर पर पड़ी। शेर उसे देखकर प्रसन्न हुआ और अपना शिकार बनाने के लिए उसकी ओर बढ़ने लगा। बहुला भयभीत हो गई, लेकिन उस समय भी उसे अपने बछड़े की चिंता थी। जैसे ही शेर उसकी ओर बढ़ा, बहुला ने विनम्रता से कहा कि अभी उसे न खाए। उसने बताया कि घर पर उसका बछड़ा भूखा है और वह पहले उसे दूध पिलाकर वापस आएगी। इसके बाद शेर उसे अपना शिकार बना सकता है।
शेर ने कहा कि वह उसकी बात पर विश्वास कैसे करे। तब बहुला ने उसे विश्वास दिलाया और वचन दिया कि बछड़े को दूध पिलाने के बाद वह अवश्य वापस आएगी। बहुला अपनी गौशाला में लौटी और बछड़े को दूध पिलाया। उसे प्यार से दुलारने के बाद वहीं छोड़कर अपने वचन को निभाने के लिए फिर जंगल में शेर के पास पहुंच गई।
वचन निभाने से प्रसन्न हुए कृष्ण
बहुला को वापस अपने सामने देखकर शेर आश्चर्यचकित हो गया। कथा के अनुसार, वास्तव में वह शेर भगवान श्रीकृष्ण ही थे, जो बहुला की परीक्षा लेने के लिए शेर का रूप धारण करके आए थे। बहुला की सत्यनिष्ठा और अपने वचन के प्रति समर्पण देखकर श्रीकृष्ण अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हुए। भगवान श्रीकृष्ण ने बहुला से कहा कि वे उससे बहुत प्रसन्न हैं और वह उनकी परीक्षा में सफल हुई है। उन्होंने बहुला को आशीर्वाद देते हुए कहा कि भविष्य में भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को उसकी पूजा की जाएगी। गौमाता के रूप में उसका सम्मान किया जाएगा और जो भी श्रद्धापूर्वक यह व्रत करेगा, उसे सुख, समृद्धि, धन-ऐश्वर्य और संतान सुख की प्राप्ति होगी।
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