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Apara Ekadashi 2021 Katha: अचला एकादशी व्रत से मिलता है अपार धन, जानें क्या है व्रत कथा

Tue, 01 Jun 2021 07:19 AM IST
रुस्तम राणा धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

ज्येष्ठ माह कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को ही अपरा एकादशी या अचला एकादशी कहते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस एकादशी व्रत से सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति और सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
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अचला एकादशी 2021 व्रत कथा - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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ज्येष्ठ माह कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को अचला या अपरा एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस साल अचला एकादशी व्रत 6 जून रविवार के दिन रखा जाएगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस एकादशी व्रत से सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति और स्वर्ग लोक की प्राप्ति होती है। नियमानुसार व्रत रखने वाले को इस दिन अपरा एकादशी व्रत कथा को जरूर सुनना चाहिए। 

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अचला एकादशी व्रत मुहूर्त
एकादशी तिथि 5 जून शनिवार को सुबह 04:07 बजे से शुरू हो जाएगी। जबकि इस तिथि का समापन 6 जून रविवार को सुबह 06:19 बजे होगा। वहीं व्रत पारण मुहूर्त अगले दिन यानि 7 जून को सुबह 05:12 बजे से 07:59 बजे तक रहेगा।   

अचला एकादशी व्रत विधि
प्रातः सूर्योदय से पहले उठें। शौच क्रिया से निवृत्त होकर स्नान-ध्यान करें। व्रत का संकल्प लेकर विष्णु जी की पूजा करें। पूरे दिन अन्न का सेवन न करें। जरूरत पड़े तो फलाहार लें। शाम को विष्णु जी की आराधना करें। विष्णुसहस्रनाम का पाठ करें। व्रत पारण के समय नियमानुसार व्रत खोलें। व्रत खोलने के पश्चात् ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा दें।
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अचला एकादशी व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, महीध्वज नामक एक धर्मात्मा राजा था। राजा का छोटा भाई वज्रध्वज बड़े भाई से द्वेष रखता था। एक दिन अवसर पाकर इसने राजा की हत्या कर दी और जंगल में एक पीपल के नीचे उसने राजा की लाश को दफन कर दिया। अकाल मृत्यु होने के कारण राजा की आत्मा प्रेत बनकर पीपल पर रहने लगी। मार्ग से गुजरने वाले हर व्यक्ति को आत्मा परेशान करती थी। एक दिन एक ऋषि इस रास्ते से गुजर रहे थे। इन्होंने प्रेत को देखा और अपने तपोबल से उसके प्रेत बनने का कारण जाना। ऋषि ने पीपल के पेड़ से राजा की प्रेतात्मा को नीचे उतारा और परलोक विद्या का उपदेश दिया। राजा को प्रेत योनि से मुक्ति दिलाने के लिए ऋषि ने स्वयं अपरा एकादशी का व्रत रखा और द्वादशी के दिन व्रत पूरा होने पर व्रत का पुण्य प्रेत को दे दिया। एकादशी व्रत का पुण्य प्राप्त करके राजा प्रेत योनि से मुक्त हो गया और स्वर्ग चला गया।

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