17 नवंबर 2018 को आंवला नवमी है, जिसे अक्षय नवमी के नाम से भी जाना जाता है। आंवला नवमी कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि पर मनाई जाती है। इस व्रत को करने पर अक्षय फल की प्राप्ति होती है। शास्त्रों के अनुसार अक्षय नवमी के दिन किया गया पुण्य कभी समाप्त नहीं होता है। इस दिन जो भी शुभ कार्य जैसे दान, पूजा, भक्ति, सेवा आदि किया जाता है उनका पुण्य कई-कई जन्म तक प्राप्त होता है। यह व्रत उत्तरी भारत में मनाया जाता है। इस दिन आंवले के पेड़ के नीचे भोजन पकाया जाता है और परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठकर भोजन करते हैं। महिलाएं इस व्रत को संतान का सुख प्राप्त करने और उनकी मंगलकामना के लिए करती हैं। आइए जानते हैं आंवला नवमी व्रत कथा और पूजा विधि।
आंवला नवमी व्रत-कथा
आंवला नवमी के दिन आंवले के पेड़ की पूजा और इसके नीचे भोजन करने की परंपरा की शुरुआत करने वाली माता लक्ष्मी को माना जाता है। इस संदर्भ में एक कथा है कि एक बार माता लक्ष्मी पृथ्वी भ्रमण करने आयीं। रास्ते में उन्हें भगवान विष्णु और शिव की पूजा एक साथ करने की इच्छा हुई। लक्ष्मी मां ने विचार किया कि एक साथ विष्णु एवं शिव की पूजा कैसे हो सकती है। तभी उन्हें ख्याल आया कि तुलसी और बेल का गुण एक साथ आंवले के पेड़ में ही पाया जाता है। तुलसी भगवान विष्णु को प्रिय होती है और बेल पत्र भगवान शिव को।
आंवले के वृक्ष को विष्णु और शिव का प्रतीक चिन्ह मानकर मां लक्ष्मी ने आंवले की वृक्ष की पूजा की। पूजा से प्रसन्न होकर विष्णु और शिव प्रकट हुए। लक्ष्मी माता ने आंवले के वृक्ष के नीचे भोजन बनाकर विष्णु और भगवान शिव को भोजन करवाया। इसके बाद स्वयं भोजन किया। जिस दिन यह घटना हुई थी उस दिन कार्तिक शुक्ल नवमी तिथि थी। इसी समय से यह परंपरा चली आ रही है।
आंवला नवमी पूजा विधि
आंवला नवमी के दिन महिलाएं सुबह स्नानकर अपने आस-पास स्थित किसी आंवले के पेड़ के पास जाकर उस जगह पर साफ-सफाई करें। इसके बाद आंवले के पेड़ के नीचे पूर्व दिशा में खड़े होकर जल और दूध अर्पित करें। इसके बाद पूजा आदि करने के बाद पेड़ के चारों तरफ सूत लपेटकर परिक्रमा करें। अंत में आंवले की आरती उतारकर परिवार के सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।