जहां लड़कियों को बोझ समझ कच्ची उम्र में ब्याह दिया जाता रहा है, उसी इतवारिया गांव की कनकलता आज अपने गांव का गौरव बनी हुई है। कानून की पढ़ाई करते हुए गांव की महिलाओं और किशोरियों को शिक्षित कर रही है, एक एन.जी.ओ. में काम भी कर रही है। अगर उसने जिद न ठानी होती, अगर उसके जीजा ने आकर उसके माता-पिता को ठीक से समझाया न होता, तो कनकलता भी गांव की और बहुत सी लड़कियों की तरह बाल विवाह के शिकंजे में फंसकर अपना जीवन तकलीफों से भर चुकी होती।
बाल विवाह का दंश झेल रही अपनी बड़ी बहन की तकलीफों से कनकलता ने बहुत कुछ सीखा था। इसलिए जब दसवीं में पढ़ रही 15 साल की कनकलता की शादी की बात घर में चली तो उसने माता-पिता को मनाने में नाकामयाब रहने पर भी हार न मानी और आनन-फानन में अपने जीजा को बुलवाया। उन्हें राजी कर फिर उनके जरिये अपने माता-पिता को मनवाया और अपनी पढ़ाई जारी रखी।
आज कनकलता के ही माता-पिता को उसपर गर्व होता है। गांव की और लड़कियां तो उसे रोल-मॉडल मानती ही मानती हैं।अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड और जे.एम.सी. के साझा अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने स्मार्टफोन फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।