सिंपी कहती है, मेरी मां अगर पढ़ी-लिखी होतीं तो जब मेरे पापा बीमार पड़े थे, तब घर पर आई आर्थिक तंगी को वे टाल सकती थीं। मैं हर हाल में अपने पैरों पर खड़े होना चाहती हूं ताकि अपने परिवार की जरूरत के समय उसका सहारा बन सकूं। इग्नू से बीएससी करने के साथ ही मैं डॉक्टर बनने के लिए तैयारी कर रही हूं।
इकौना ब्लॉक के दसियापुर गांव की सिंपी शुक्ला बताती है कि गांव वालों की समझाइश पर चलते तो हाई स्कूल में पढ़ते समय ही उसकी शादी हो गई होती। 'मां तो तैयार हो ही गई थीं, मैंने पापा से कहा कि भाइयों के जैसे मुझे भी पढ़ना है, अच्छा पढ़कर डॉक्टर बनना है।' तब पापा ने कहा कि मैं सब परेशानी झेल कर भी तुम्हें पढ़ाऊंगा।
और आज सिंपी अपने पापा की समझदारी की छाया में डॉक्टर बनने के अपने सपने की ओर विश्वास से बढ़ रही है। बहुत गर्व है उसे अपने पापा पर कि उन्होंने दिक्कतें झेल कर भी बेटी का साथ दिया।
स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी शशि ने यह वीडियो कथा बनाई है।
अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे।एम।सी। के साझा अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।