छह बहनों और एक भाई वाले परिवार में बड़ी हुई साधना का बाल विवाह होना तो करीब करीब तय ही था। “हमारी जाति में तो बाल विवाह एकदम आम बात है। फिर भी मैं जिद पर अड़ी और आज बी.ए.-बीबीए करने के बाद एक बड़े एनजीओ में गांव के बच्चों के लिए काम कर रही हूं।”
गिलौला ब्लॉक के खैराकला गांव की साधना आज कुछ बेहतर करने की खुशी है। सेव द चिल्ड्रन संस्था में हेल्थ वालंटियर के रूप में काम करते हुए साधना बाल विवाह के खिलाफ भी जम कर काम कर रही है। उसने न केवल अपना बाल विवाह रुकवाया बल्कि अपनी छोटी बहन के लिए भी ढाल बनकर सामने आई और उसे भी बाल विवाह से बचाया।
गांव की लड़कियों बचने के गुर बताते हुए साधना कहती है, अगर माता-पिता बाल विवाह के लिए दबाव बना रहे हों तो उनसे पहले तो खुद ही खुल कर बात करनी चाहिए। अगर किसी भी सूरत में न मानें तो फिर गांव के मास्टर साहब या सामाजिक कार्यकर्ता की मदद लेनी चाहिए।
अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड और जे.एम.सी. के साझा अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।