इस बीच एक चरवाहे की मदद से रेलवे ट्रैक शिमला पहुंचाया गया। रेलवे ट्रैक को बनाते हुए टनल नंबर 33 के छोर आपस में न मिलने पर ब्रिटिश हुकूमत ने अपने एक अंग्रेज इंजीनियर को एक रुपये जुर्माना लगाया था। इंजीनियर को इस पर इतनी शर्मिंदगी महसूस हुई की उसने खुदकुशी कर ली। 33 नंबर टनल के छोर आपस में मिलने में इंजीनियर बरोग असफल हुए थे।
इसके बाद एक साधारण चरवाहे बाबा भलकू ने अपनी छड़ी से राह दिखाई तब जा कर टनल के छोर आपस में मिले। बाद में इंजीनियर बरोग के नाम पर इस टनल का नाम ही बड़ोग टनल पड़ गया। यह टनल कालका-शिमला रेलवे की सबसे लंबी टनल है और इसकी लंबाई 1143.61 मीटर है। कालका-शिमला रेलवे मार्ग के अलावा हिंदुस्तान-तिब्बत मार्ग के निर्माण में भी बाबा भलखू की अहम भूमिका रही थी।
बाकायदा इसकी पुष्टि अंग्रेजी हुकूमत के दौरान लिखे गए दस्तावेजों में मौजूद है। अंग्रेज अधिकारी सी. बैचलर और जेजी क्लार्सन ने भी अपनी किताबों में बाबा भलखू के योगदान का जिक्र किया है। शिमला में पुराने बस अड्डे के पास रेलवे के संग्रहालय के बाहर बाबा भलकू की प्रतिमा लगाई गई है। संग्रहालय को भी बाबा भलकू रेल संग्रहालय का नाम दिया गया है।