मध्य हिमालय की शिवालिक पहाड़ियों में बसे मानगढ़ में बना शिव मंदिर ऐसा धार्मिक स्थल है, जहां लोगों का भारी संख्या में आना-जाना लगा रहता है। पांडवों द्वारा निर्मित इस मंदिर के दरवाजे को एक बड़ी शिला से काटकर बनाया गया है, जिस पर अद्भुत नक्काशी की गई है। यह मंदिर हिमाचल ही नहीं, बल्कि अपने प्राचीनतम इतिहास को लेकर पूरे भारत व विश्वभर में प्रसिद्ध है।
नक्षत्र दर्शन में दर्शाए हैं पांच ग्रह
मंदिर की दीवारों पर खुदे नक्षत्र दर्शन में पांच ग्रह ही दर्शाए गए हैं, जो इसके प्राचीनतम इतिहास के गवाह हैं। मंदिर के पिछले हिस्से में गाय को मारते हुए बाघ व बाघ को मारते हुए अर्जुन के चित्रों को पत्थरों पर दिखाया गया है। पांडवों द्वारा निर्मित इस शिव मंदिर के समीप ही भगवान कृष्ण का मंदिर है।
अभी यह पता नहीं कि यह मंदिर कितना पुराना है। कृष्ण मंदिर में पूजा अर्चना के साथ-साथ जन्माष्टमी पर मेले का आयोजन भी किया जाता है। शिव व कृष्ण मंदिर के पास एक नाला बहता है। जो थोड़ी दूरी पर एक बडे़ झरने का रूप धारण कर लेता है। इसे सिरमौर जिला का सबसे ऊंचा झरना बताया गया है। इसकी ऊंचाई 122 मीटर है।
मंदिर को लेकर अलग-अलग राय
मानगढ़ स्थित शिव मंदिर कितना पुराना है। इसको लेकर लोगों की अलग-अलग राय है। मगर शोधकर्ताओं द्वारा यह मंदिर करीब 1500 साल से अधिक पुराना बताया गया है। वर्ष 1995 में यह शिव मंदिर पुरातत्व विभाग के अधीन चला गया था। विडंबना यह भी है कि पुरात्व विभाग के अधीन चले जाने के बाद भी यह मंदिर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान नहीं बना पाया। वर्ष 2003-04 में शिव मंदिर के समीप खुदाई के दौरान पुरातत्व विभाग को एक गणेश मंदिर भी मिला था।
इसका निर्माण गुप्त काल की शैली में हुआ बताया जाता है। यह मंदिर ईसा में 2500 वर्ष पूर्व निर्मित या पांचवी, छठी शताब्दी का बताया जाता है। पुरातत्व विभाग के पास शिव मंदिर के आसपास दो बीघा जमीन है। जिसमें विभाग कई बार खुदाई का कार्य कर नए मंदिरों के बारे में और जानकारी जुटाने के प्रयास किया जा चुका है। पुरातत्व विभाग द्वारा यहां एक स्मारक परिचायक भी नियुक्त किया गया है, जो मंदिरों के रखरखाव का ध्यान रखता है। यह जिला सिरमौर का एकमात्र मंदिर है, जिसका पुरातत्व विभाग ने अधिग्रहण किया है।