शिमला। भारत और तिब्बत के संबंध केवल राजनीति तक सीमित नहीं हैं। नदियों, व्यापार, संस्कृति, चिकित्सा और साहित्य ने भी दोनों क्षेत्रों को सदियों से जोड़े रखा है। यह बात राजनीति विज्ञान विभाग में आयोजित अतिथि व्याख्यान में तिब्बती विद्वान आचार्य येशी फुंत्सोक ने कही। भारत-तिब्बत संबंध विषय पर आयोजित व्याख्यान में आचार्य येशी फुंत्सोक मुख्य वक्ता रहे। उन्होंने पांच महत्वपूर्ण ग्रंथों के माध्यम से दोनों क्षेत्रों के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध समझाए। उन्होंने तिब्बती संस्कृति, साहित्य और वास्तुकला के विभिन्न पहलुओं पर भी प्रकाश डाला। आचार्य ने बताया कि सतलुज, सिंधु और ब्रह्मपुत्र जैसी प्रमुख नदियों का उद्गम तिब्बत क्षेत्र में होता है। उन्होंने प्राचीन व्यापारिक संबंधों और भारत में स्थापित तिब्बती मठों का भी उल्लेख किया। तिब्बत पर शोध करने वाले विभिन्न विद्वानों के योगदान की जानकारी भी दी। उन्होंने बताया कि 250 देशों के संविधानों का तिब्बती भाषा में अनुवाद किया है। विद्यार्थियों को विदेश नीति सर्वेक्षण 2024 और दलाई लामा की वॉयस ऑफ द वॉयसलेस पढ़ने की सलाह दी। कार्यक्रम में प्राचार्य डॉ. गोपाल चौहान, विभागाध्यक्ष डॉ. अजय गर्ग, त्सेरिंग युडोन और डॉ. प्रगति कश्यप मौजूद रहे। संवाद