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अब बागवानी विभाग पर फोड़ा कैंची खरीद घोटाले का ठीकरा

Wed, 23 Nov 2016 10:07 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, शिमला
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दस साल पुराने कथित कैंची खरीद घोटाले का ठीकरा हिमाचल प्रदेश एग्रो इंडस्ट्री कार्पोरेशन शिमला ने सरकार के बागवानी विभाग के सिर फोड़ा है। खरीद गड़बड़ी की आशंका पर कार्पोरेशन पर कई सवाल दागते हुए विजिलेंस ब्यूरो ने पूछा है कि खरीदी गईं प्रूनिंग कैंचियां बागवानों की मांग के अनुरूप नहीं थीं और खरीद से पहले की तकनीकी रिपोर्ट विजिलेंस ब्यूरो को आज तक नहीं मिली, ऐसा क्यों?
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इस पर कार्पोरेशन ने जवाब दिया कि यह मामला बागवानी विभाग से जुड़ा है, वहीं से पूछा जाए। राज्य बागवानी विभाग ने विदेशी कैंचियों की खरीद को प्रदेश एग्रो इंडस्ट्री कार्पोरेशन को नोडल एजेंसी बनाया था। इस खरीद पर खुली विजिलेंस जांच में कार्पोरेशन ने बागवानी महकमे को भी लपेटा है। नए सिरे से खुली विजिलेंस ब्यूरो की जांच में वर्ष 2005 की विदेशी कैंची खरीद पर कई सवाल उठाए गए हैं।

कार्पोरेशन को 16 सवालों की प्रश्नावली भेजी है। एक सवाल इसमें यह है कि दस साल पहले खरीदे गए ये उपकरण अब तक बागवानों तक क्यों नहीं पहुंचे? पहले बागवानों की पसंद-नापसंद पर एक तकनीकी रिपोर्ट बननी चाहिए थी। इसे फर्मों से डील को अंतिम रूप देने से पहले बनाना चाहिए था। ऐसी कोई रिपोर्ट अभी तक विजिलेेंस ब्यूरो को नहीं मिली।
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सूत्रों ने बताया कि जांच में फंसे कॉरपोरेशन ने विजिलेंस ब्यूरो को कहा है कि इस पर बागवानी विभाग को पूछा जाए। वहीं, विजिलेंस ब्यूरो के पुलिस अधीक्षक रमेश छाजटा का कहना है कि हिमाचल प्रदेश एग्रो इंडस्ट्री कार्पोरेशन से आए जवाब की जांच की जा रही है। दूसरी ओर, प्रदेश बागवानी विभाग के निदेशक डॉ. डीपी भंगालिया ने कहा कि यह मामला वर्ष 2005 की खरीद से संबंधित है। वे कोई भी टिप्पणी पुराना रिकॉर्ड देखने के बाद ही करेंगे।

आदेश को दरकिनार कर सरकार का बजट खर्चा
विजिलेंस ब्यूरो ने कॉरपोरेशन से पूछा है कि जर्मनी में बने गार्डेना उपकरणों और स्विस में बने फेल्को उपकरणों को बागवानी तकनीकी मिशन के तहत एक्स कंपनी के गोदाम से दिल्ली और गुड़गांव से लाया जाना था। इसमें तीन प्रतिशत डिस्काउंट मिलना था। यह नहीं मिला। आयात लागत को संबंधित फर्म ने अब तक नहीं दिखाया। कैंचियों के रेट निर्माता के  मूल्य से मेल नहीं खाते। 21 दिसंबर 2005 को कार्पोरेशन ने ये रेट खुद फाइनल किए।

कोडल औपचारिकताएं पूरी नहीं की गईं। इन उपकरणों के दामों को कार्पोरेशन अंतिम रूप नहीं दे सकता था। 21 जनवरी, 2006 के सरकारी आदेश के मुताबिक वर्ष 2005-06 में बागवानी तकनीकी मिशन में किए खर्चों को केंद्र से मिले बजट तक घटा देना चाहिए था, मगर उल्टा राज्य सरकार के बजट का इस्तेमाल किया गया। सरकार के बजट से खरीद नहीं की जा सकती थी। ये सब क्यों हुआ? 
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