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ग्रिड बचाने को 25 छात्रों की कुर्बानी!

Thu, 12 Jun 2014 05:33 AM IST
Shimla
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कुल्लू। हैदराबाद से घूमने मनाली जा रहे इंजीनियरिंग छात्रों ने नार्थ ग्रिड को फेल होने से बचाने की कीमत अपनी जान देकर चुकाई। यदि लारजी प्रोजेक्ट के विद्युत उत्पादन को 138 मेगावाट से घटाकर 32 मेगावाट पर नहीं लाया जाता, तो डैम के गेट खोलने की जरूरत नहीं पड़ती और 25 जानें भी बच जातीं।
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रीजनल लोड डिस्पैच सेंटर से आए संदेश के आधार पर स्टेट लोड डिस्पैच सेंटर ने ग्रिड में बिजली की मांग न होने के कारण लारजी में विद्युत उत्पादन घटाने को कहा, क्योंकि नार्थ ग्रिड में लोड ज्यादा हो गया था। रविवार शाम को लारजी परियोजना के प्रबंधन को मैसेज मिला कि उत्तरी ग्रिड को बिजली की कम सप्लाई दें। नहीं तो ज्यादा लोड होने के कारण उत्तरी ग्रिड फेल हो सकता। प्रोजेक्ट प्रबंधन को रविवार को 5.30 से 7.30 बजे तक बिजली की सप्लाई कम करने के लिए कहा गया। इसी कारण डैम को बचाने के लिए प्रोजेक्ट प्रबंधन को पानी छोड़ा और हादसा पेश आया।
लारजी परियोजना के चीफ इंजीनियर प्रेम लाल मासूम ने बताया कि लोड डिस्पैच सेंटर शिमला से जनरेशन कम करने का आदेश के अनुसार रविवार को लारजी प्रोजेक्ट को शाम साढ़े पांच बजे 138 मेगावाट से 96 मेगावाट विद्युत जनरेशन करने कहा गया था। 5.55 पर उत्पादन 96 मेगावाट से 64 मेगावाट किया गया। इस उत्पादन को कम करने के लिए शाम 6.15 पर बजे 50 सेंटीमीटर गेट खेल कर पानी छोड़ा। 6.40 पर उत्पादन को 32 मेगावाट पर लाया गया। शाम 7.10 पर बजे व्यास नदी में हैदराबाद से आए छात्रों के बह जाने का पता लगने पर एसएलडीसी से पावर जनरेशन के आदेश लेकर पानी को पावर हाउस से निकाला गया तथा 138 मेगावाट जनरेशन की गई। लेकिन सवाल ये है कि केवल बिजली बोर्ड के प्रोजेक्टों में ही कटौती क्यों की गई?
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खबर-2
आखिर किसने बचाए प्राइवेट बिजली प्रोजेक्ट?
ग्रिड बचाने के लिए सभी प्रोजेक्टों में क्यों नहीं हुई समान कटौती
ऐसा होता तो केवल लारजी पर दबाव न बनता और जानें बच जाती
प्राइवेट प्रोजेक्टों पर कौन था मेहरबान, जांच होगी : एसकेबीएस नेगी
अमर उजाला ब्यूरो
शिमला। लारजी हादसे ने किसी बड़े गड़बड़झाले की ओर इशारा किया है। रविवार को जिस समय ग्रिड को बचाने के नाम पर लारजी के टरबाइन बंद करवाए गए, उसी दौरान हिमाचल में स्वतंत्र विद्युत उत्पादकों के प्राइवेट प्रोजेक्ट क्षमता से अधिक बिजली बनाते रहे। ऐसे में रीजनल लोड डिस्पैच सेंटर और स्टेट लोड डिस्पैच सेंटर यदि सभी प्रोजेक्टों में विद्युत उत्पादन समान रूप से या प्रो-रेटा आधार पर घटाता तो अकेले लारजी पर दबाव न बनता और 25 जानें भी कुर्बान होने से बच जातीं।
जिस समय लारजी के टरबाइन बंद करवाए गए, उसी अवधि में 1000 मेगावाट के जेपी कंपनी के कड़छम वांगतू प्रोजेक्ट ने 1187 मेगावाट, एनजेवीएन के नाथपा झाकड़ी प्रोजेक्ट ने 1500 मेगावाट के बजाये 1602 मेगावाट, एवरेस्ट पावर कंपनी के मलाणा-2 प्रोजेक्ट ने 100 की जगह 105 मेगावाट और लैंकों कंपनी के 70 मेगावाट के बुद्धिल प्रोजेक्ट ने 69 मेगावाट बिजली पैदा की। जबकि ग्रिड को बचाने के लिए एसएलडीसी ने बिजली बोर्ड के लारजी, गिरि, भावा और एनएचपीसी के पार्वती प्रोजेक्टों पर ही कट लगाया।
बिजली प्रोजेक्ट हर यूनिट बिजली के साथ पैसा देते हैं। ऐसे में क्या ये सब मिलीभगत से हो रहा है? क्या लोड डिस्पेच सेंटर से कुछ लोग प्राइवेट बिजली प्रोजेक्टों को बचा रहे हैं? यदि ऐसा है तो इसके बदले किसको फायदा हो रहा है? इन सवालों के जवाब के लिए जब प्रधान सचिव ऊर्जा एसकेबीएस नेगी से पूछा गया तो उन्होंने बताया कि वह जांच कर रहे हैं कि प्राइवेट प्रोजेक्टों को बैकडाउन से क्यों छोड़ा गया? इस बारे में भारत सरकार और राज्य सरकार को रिपोर्ट भेजी जा रही है।
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